खैरागढ़ में प्लास्टिक संस्कृति पर हुआ पलटवार, विश्वविद्यालय में इंस्टॉलेशन प्रदर्शनी ने खींचा ध्यान

बांस शिल्प और ग्रामीण जीवन के संकट की कलात्मक रूप में हुई प्रस्तुति
सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के परिसर क्रमांक-1 में एमएफए विद्यार्थियों द्वारा आयोजित इंस्टॉलेशन कला प्रदर्शनी ने दर्शकों को ग्रामीण संस्कृति पर्यावरण और पारंपरिक शिल्प के संरक्षण पर गंभीर सोचने को मजबूर कर दिया। प्रदर्शनी में प्लास्टिक संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से दम तोड़ती ग्रामीण परंपराओं और बांस शिल्पकारों की पीड़ा को रचनात्मक ढंग से उकेरा गया है। एमएफए प्रथम वर्ष के छात्र अनमोल गोयल द्वारा तैयार इंस्टॉलेशन कला ने अपनी प्रतीकात्मक प्रस्तुति और सामाजिक सरोकारों के कारण विशेष आकर्षण हासिल किया। प्रदर्शनी का मुख्य केंद्र बांस से निर्मित झोपड़ीनुमा संरचना रही जिसे चारों ओर से काले प्लास्टिक और पन्नियों से ढंका गया था। इसके माध्यम से यह संदेश दिया गया कि आधुनिक उपभोक्तावाद और प्लास्टिक संस्कृति धीरे धीरे प्राकृतिक जीवनशैली तथा पारंपरिक हस्तशिल्प को निगल रही है।

परंपरागत शिल्प को आधुनिक पहचान देने का प्रयास
प्रदर्शनी में स्थानीय बांस कलाकारों द्वारा निर्मित घड़ियां, सजावटी लैंप, फर्नीचर, खिलौने और मिनिएचर कलाकृतियां भी प्रदर्शित की गईं। कलाकारों ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि यदि पारंपरिक शिल्प को आधुनिक डिजाइन और उपयोगिता से जोड़ा जाए तो ग्रामीण कारीगर आत्मनिर्भर बनने के साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत हो सकते हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा ने विद्यार्थियों की रचनात्मक सोच की सराहना करते हुए कहा कि समाज और कलाकारों के जीवन से जुड़ी समस्याओं को कला के माध्यम से अभिव्यक्त करना सकारात्मक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
चित्रों में दिखा बांस कलाकारों का संघर्ष
इंस्टॉलेशन के साथ आयोजित चित्रकला प्रदर्शनी में बांस शिल्पकारों के पारिवारिक जीवन संघर्ष और सामाजिक परिस्थितियों को मिक्स मीडिया एवं चारकोल जैसे माध्यमों से दर्शाया गया। चित्रों ने दर्शकों को ग्रामीण कलाकारों के जीवन के भीतर छिपे संघर्षों और बदलती परिस्थितियों को करीब से महसूस करने का अवसर दिया। अपने कॉन्सेप्ट नोट में अनमोल गोयल ने कहा कि यदि पारंपरिक कलाकारों को आधुनिक बाजार और नई डिजाइन सोच से नहीं जोड़ा गया तो उनकी पहचान और कला दोनों संकट में पड़ जाएंगी। उन्होंने पारंपरिक शिल्प में आधुनिकता के समावेश को संरक्षण का प्रभावी उपाय बताया।
सामूहिक सहयोग से तैयार हुई कला स्थापना
इस कला स्थापना को आकार देने में छात्रावास के विद्यार्थियों और सहपाठियों ने सामूहिक रूप से मेहनत की। प्रदर्शनी ने केवल कलात्मक अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण ग्रामीण हस्तशिल्प संवर्धन और पारंपरिक कलाओं के पुनर्जीवन का भी सशक्त संदेश दिया है।

