
पात्रों ने शिक्षा व्यवस्था और अवसरों की बराबरी पर उठाये सवाल
खैरागढ़। राजकुमारी इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के कैम्पस 2 स्थित ऑडिटोरियम में 5 अक्टूबर की शाम 6 बजे डॉ.शंकर शेष लिखित नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य’ का मंचन हुआ। नाटक का निर्देशन डॉ.शिशु कुमार सिंह ने किया। प्रस्तुति के दौरान कुलपति डॉ.लवली शर्मा, डॉ.राजन यादव, डॉ.मानस साहू और डॉ.कौस्तुभ रंजन मौजूद रहे। मंचन के दौरान कलाकारों के संवाद और अभिनय पर दर्शकों ने खूब तालियां बजाईं और प्रस्तुति के अंत तक नाटक से जुड़े रहे। नाटक की शुरुआत महाभारत काल की उस घटना से होती है जब निषाद पुत्र एकलव्य धनुर्विद्या सीखने की चाह में गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचा। उस समय द्रोणाचार्य कौरव और पांडव राजकुमारों के गुरु थे और अर्जुन को संसार का सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन दे चुके थे। इसी वचन का हवाला देकर उन्होंने एकलव्य को शिष्य बनाने से इनकार कर दिया।एकलव्य ने हार नहीं मानी। उसने जंगल में द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाई और उसी को अपना गुरु माना और रोज अभ्यास करता रहा। लगातार साधना से वह इतना निपुण हो गया कि अर्जुन से भी आगे निकल गया। जब द्रोणाचार्य को इसका पता चला तो उन्होंने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से उसके दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने अंगूठा दे दिया और इसी के साथ उसकी प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल सका।
आज के कटघरे में खड़ा हुआ पुराना सवाल
एक और द्रोणाचार्य’ इसी पौराणिक कथा को आज के समय से जोड़ता है। नाटक में मंच पर अदालत का दृश्य रचा गया जहां वकील और जज के सामने यह मामला रखा जाता है। प्रिंसिपल और प्रेसिडेंट जैसे आधुनिक किरदार शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर सामने रखते हैं जबकि अर्जुन, भीष्म, युधिष्ठिर और अश्वत्थामा जैसे पौराणिक पात्र कहानी को अतीत और वर्तमान के बीच जोड़ते हैं। प्रस्तुति में गुरु-शिष्य परंपरा, शिक्षा व्यवस्था, प्रतिभा, अवसर और व्यवस्था के बीच के टकराव को प्रभावी ढंग से उभारा गया। नाटक का केंद्रीय प्रश्न यही रहा कि अगर किसी के पास प्रतिभा हो और फिर भी उसे मौका न मिले तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है। नाटक ने किसी एक दौर की कहानी बताने के बजाय पुराने प्रसंग के जरिए आज की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। नाटक में द्रोणाचार्य की भूमिका काव्य त्रिमले ने निभाई। एकलव्य एवं वकील की दोहरी भूमिका में वंदिता पांडेय नजर आईं। आशुतोष द्विवेदी ने अरविंद, अंजली सिंह ने लीला, प्रांशु पांडेय ने यदु और अश्वत्थामा तथा हर्षित डेहरिया ने चंदू का किरदार निभाया। दीक्षा बघेल ने कृपि और हर्ष अग्रवाल ने प्रेसिडेंट की भूमिका निभाई साथ ही याचिका ने वकील-2, सुगंधा ने अनुराधा और ओमेंद्र ने विमलेंदु का किरदार निभाया। रुद्र ने भीष्म, प्रिंसिपल एवं युधिष्ठिर की भूमिकाएं निभाईं। छोटे अश्वत्थामा के रूप में याचना, सैनिक के रूप में श्रेया, अर्जुन के रूप में विशाल और जज के रूप में दीपाली ने बखूबी अभिनय किया। मंच के पीछे भी पूरी टीम ने जिम्मेदारी संभाली। प्रकाश एवं मंच सज्जा का कार्य हर्ष अग्रवाल और ओमेंद्र ने संभाला। संगीत आशुतोष द्विवेदी, छत्रपाल और हर्षित डेहरिया ने दिया। पार्श्व मंच प्रबंधन दीक्षा बघेल ने किया जबकि वेशभूषा की जिम्मेदारी वंदिता पांडेय ने निभाई। आशुतोष द्विवेदी इस प्रस्तुति के सहायक निर्देशक रहे।