
300 वर्ष पुरानी परंपरा में उमड़ा आस्था का सैलाब
ऐतिहासिक रथ यात्रा में हजारों श्रद्धालु हुए शामिल
सत्यमेव न्यूज छुईखदान। नगर की ऐतिहासिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले लगभग 300 वर्ष पुराने जगन्नाथ मंदिर से गुरुवार को भगवान जगन्नाथ बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा श्रद्धा और उल्लास के बीच निकाली गई। भगवान के नगर भ्रमण के दौरान पूरा शहर जय जगन्नाथ के जयघोष से गूंज उठा। रथ यात्रा में हजारों श्रद्धालुओं ने शामिल होकर दर्शन किए तथा रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त किया है। रथ यात्रा का शुभारंभ मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार और विधिवत पूजा-अर्चना के साथ हुआ। विशेष श्रृंगार और महाआरती के बाद भगवान जगन्नाथ बलभद्र और सुभद्रा को आकर्षक रथ पर विराजमान कर नगर भ्रमण के लिए रवाना किया गया। यात्रा मार्ग में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने रंगोली सजाई पुष्पवर्षा की और आरती उतारकर भगवान का स्वागत किया है। रथ यात्रा मंदिर परिसर से प्रारंभ होकर जमात पारा राजमहल चौक जैन मोहल्ला ब्राह्मण पारा महोबिया पारा जमुना चौक जयस्तंभ चौक बस स्टैंड बाजार लाइन आजाद चौक केवट पारा और कड़रा पारा सहित नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई बड़े जमात मंदिर पहुंची। पूरे मार्ग में श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था। युवाओं महिलाओं और बुजुर्गों ने बढ़-चढ़कर रथ खींचा। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान के रथ को खींचना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। रथ यात्रा के दौरान नगर में मेले जैसा माहौल रहा। मंडई से भी बड़ा बाजार सजा जहां आसपास के गांवों और दूर-दराज क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने खरीदारी के साथ भगवान के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया। दर्शन के बाद श्रद्धालुओं को पारंपरिक गजा और मूंग का प्रसाद वितरित किया गया। मंदिर समिति की ओर से महाभोग और विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया जिसमें हजारों लोगों ने प्रसाद ग्रहण किया है। लगातार नौ वर्षों से जय जगन्नाथ सेवा समिति के सदस्य रथ यात्रा के अवसर पर नि:स्वार्थ भाव से भंडारे का संचालन कर श्रद्धालुओं की सेवा कर रहे हैं। समिति के इस सेवा कार्य की नगरवासियों ने सराहना की।
ऐतिहासिक धरोहर है जगन्नाथ मंदिर
छुईखदान का जगन्नाथ मंदिर नगर की ऐतिहासिक धरोहरों में प्रमुख स्थान रखता है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार मंदिर का निर्माण लगभग 300 वर्ष पूर्व तत्कालीन रियासत काल में कराया गया था। इसकी प्राचीन वास्तुकला विशाल लकड़ी के दरवाजे और पारंपरिक निर्माण शैली आज भी अपनी ऐतिहासिक पहचान को संजोए हुए हैं। मंदिर से जुड़ी जनश्रुति के अनुसार इसके नीचे एक प्राचीन सुरंग मौजूद है, जिसका उपयोग रियासत काल में राजा-महाराजा अपने महल से मंदिर तक आने-जाने के लिए करते थे। यद्यपि इसका कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है लेकिन यह लोकमान्यता मंदिर के ऐतिहासिक महत्व को और भी विशेष बनाती है। धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ यह रथ यात्रा छुईखदान की सामाजिक एकता सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक आस्था का जीवंत प्रतीक मानी जाती है। हर वर्ष यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का कार्य करता है।

