
निर्माण पूरा होने से पहले क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत शुरू
सामग्री और तकनीकी मानकों की जांच की उठी मांग
खैरागढ़। करीब 90 करोड़ रुपये की लागत से निर्माणाधीन राजनांदगांव-खैरागढ़ स्टेट हाईवे पर पहली बारिश के बाद कई जगह डामर उखड़ने और गड्ढे बनने से निर्माण की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। खास बात यह है कि सड़क का निर्माण अभी पूरा भी नहीं हुआ है और क्षतिग्रस्त हिस्सों में बारिश थमते ही मरम्मत का काम शुरू कर दिया गया है। ऐसे में स्थानीय लोगों ने सड़क निर्माण में इस्तेमाल सामग्री, डामर की गुणवत्ता, सड़क की निर्धारित मोटाई और निर्माण प्रक्रिया की तकनीकी जांच कराने की मांग की है।राजनांदगांव-खैरागढ़ मार्ग डोंगरगढ़ होते हुए महाराष्ट्र की ओर जाने वाला प्रमुख संपर्क मार्ग है। इस मार्ग पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में छोटे-बड़े वाहनों की आवाजाही होती है। निर्माणाधीन सड़क के कई हिस्सों में अधूरा काम, जगह-जगह बिखरी निर्माण सामग्री और क्षतिग्रस्त सतह के कारण वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
पहली बारिश में उखड़ा डामर, शुरू हुई मरम्मत
खैरागढ़ से बढ़ईटोला के बीच सड़क निर्माण का काम अलग-अलग चरणों में चल रहा है। कई स्थानों पर सड़क पर गिट्टी बिछाकर काम अधूरा छोड़ा गया है जबकि कुछ हिस्सों में डामरीकरण किया जा चुका है। स्थानीय लोगों के अनुसार डामरीकरण वाले कुछ हिस्सों में पहली बारिश के बाद ही डामर उखड़ने और गड्ढे बनने की स्थिति सामने आई है।क्षतिग्रस्त हिस्सों में अब मरम्मत का काम कराया जा रहा है। इसी को लेकर निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि यदि सड़क का निर्माण निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप किया गया है तो कम समय में क्षति होने के कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए वहीं मरम्मत के साथ-साथ क्षतिग्रस्त हिस्सों की तकनीकी जांच भी जरूरी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि नुकसान किन कारणों से हुआ।
सिर्फ रिपेयरिंग नहीं, तकनीकी परीक्षण की जरूरत
स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षतिग्रस्त हिस्सों पर मरम्मत कर देने से गुणवत्ता से जुड़े सवाल समाप्त नहीं होंगे। सड़क निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की गुणवत्ता, डामर की मात्रा और मोटाई, बेस एवं सब-बेस की मजबूती तथा निर्माण प्रक्रिया की निर्धारित मानकों के अनुरूप जांच की जानी चाहिए।लोगों ने संबंधित विभाग से मांग की है कि सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्सों का स्वतंत्र अथवा सक्षम तकनीकी एजेंसी से परीक्षण कराया जाए। जांच में यदि निर्धारित मापदंडों में किसी तरह की कमी सामने आती है तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जाए।
धूल के गुबार से राहगीर परेशान
निर्माणाधीन सड़क पर नियमित पानी का छिड़काव नहीं होने से भारी वाहनों के गुजरने के दौरान धूल के गुबार उठ रहे हैं। इससे दोपहिया वाहन चालकों के साथ अन्य वाहनों के चालकों को भी परेशानी होती है। सड़क किनारे स्थित दुकानों और घरों तक धूल पहुंचने से स्थानीय रहवासी भी प्रभावित हो रहे हैं।
स्कूली बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता
इस मार्ग से स्कूली बच्चों सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण प्रतिदिन आवागमन करते हैं। निर्माणाधीन हिस्सों में गड्ढे, धूल, भारी वाहनों की आवाजाही और पर्याप्त यातायात संकेतकों की कमी दुर्घटना की आशंका बढ़ा सकती है। स्थानीय लोगों ने निर्माण कार्य पूरा होने तक नियमित पानी छिड़काव, चेतावनी संकेतक, बैरिकेडिंग और अन्य आवश्यक यातायात सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की मांग की है।
90 करोड़ की सड़क पर उठे ये सवाल
पहली बारिश के बाद कई स्थानों पर डामर क्यों उखड़ा?निर्माण पूरा होने से पहले क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत की जरूरत क्यों पड़ी?सड़क निर्माण में इस्तेमाल सामग्री और डामर की गुणवत्ता की जांच कब होगी?निर्धारित मोटाई और निर्माण तकनीकी मानकों का पालन हुआ या नहीं?मरम्मत से पहले क्षति के वास्तविक कारणों का तकनीकी परीक्षण होगा या नहीं?निर्माण में कमी मिलने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?निर्माणाधीन मार्ग पर धूल नियंत्रण और यातायात सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं हैं?
जांच से ही साफ होगी तस्वीर
करीब 90 करोड़ रुपये की लागत वाले इस महत्वपूर्ण मार्ग के निर्माण को लेकर सामने आ रही शिकायतों के बीच अब निगाहें संबंधित विभाग की तकनीकी जांच पर टिकी हैं। सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्सों का वैज्ञानिक परीक्षण और निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि सड़क को नुकसान बारिश, यातायात दबाव, निर्माण प्रक्रिया अथवा सामग्री की गुणवत्ता से जुड़ी किसी कमी के कारण हुआ है। ऐसे में स्थानीय लोगों की मांग है कि मरम्मत के साथ गुणवत्ता परीक्षण भी कराया जाए ताकि सार्वजनिक धन से हो रहे निर्माण कार्य की गुणवत्ता और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित हो सकें।



