श्री सीमेंट फैक्ट्री और चूना पत्थर खनन के विरोध में किसानों का प्रदर्शन, 80 से अधिक वाहनों के काफिले के साथ भिलाई पहुंचे ग्रामीण

पर्यावरण विभाग को सौंपा ज्ञापन, खनन परियोजनाएं निरस्त करने, फैक्ट्री पर रोक और कृषि भूमि वापस करने की मांग
खैरागढ़। खैरागढ़ क्षेत्र में प्रस्तावित श्री सीमेंट फैक्ट्री और चूना पत्थर खनन परियोजनाओं के विरोध में किसान अधिकार संघर्ष समिति के बैनर तले किसानों ने भिलाई में प्रदर्शन किया। दनिया, अतरिया, हनईबन, उदयपुर, संडी, बुंदेली और सीताडबरी सहित आसपास के गांवों के किसान 80 से अधिक बसों और चारपहिया वाहनों के काफिले के साथ बत्तीस बंगला स्थित पर्यावरण विभाग के कार्यालय पहुंचे और अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा।
खेती, पानी और पर्यावरण की सुरक्षा की मांग
समिति ने संडी, हनईबन, बुंदेली और सीताडबरी में प्रस्तावित चूना पत्थर खनन परियोजनाओं को निरस्त करने, श्री सीमेंट फैक्ट्री की स्थापना पर स्थायी रोक लगाने तथा किसानों से ली गई कृषि भूमि वापस करने की मांग की। साथ ही स्थानीय किसानों की आपत्तियों और सहमति से जुड़े मुद्दों पर नियमानुसार विचार किए बिना जनसुनवाई एवं पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाने की मांग रखी। प्रदर्शनकारी किसानों ने आशंका जताई कि खनन और सीमेंट उद्योग से भूजल स्तर, वायु गुणवत्ता, मिट्टी और फसल उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं। उनका कहना है कि खेती ग्रामीण परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार है, इसलिए कृषि भूमि, जल स्रोतों और पर्यावरण की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। प्रदर्शन में महिला किसानों सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए।
मांगें पूरी नहीं होने पर आंदोलन तेज करने की चेतावनी
प्रदर्शन का नेतृत्व समिति की अध्यक्ष लुकेश्वरी जंघेल के साथ मुकेश पटेल, नोहर जंघेल, प्रमोद सिंह, बीरेंद्र जंघेल, श्रवण जंघेल, विक्रम सिंह और सौरभ जंघेल सहित अन्य पदाधिकारियों एवं ग्रामीण प्रतिनिधियों ने किया। प्रदर्शनकारियों के अनुसार पर्यावरण विभाग के अधिकारियों ने ज्ञापन स्वीकार कर नियमानुसार कार्रवाई का आश्वासन दिया। हालांकि विभाग की ओर से किसी विस्तृत लिखित प्रतिक्रिया या अंतिम निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है। समिति ने चेतावनी दी कि मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होने पर आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।किसानों का कहना है कि विकास के नाम पर उनकी आजीविका, कृषि भूमि और प्राकृतिक संसाधनों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।उन्होंने मांग की कि परियोजनाओं से जुड़े निर्णय पारदर्शी प्रक्रिया, निष्पक्ष पर्यावरणीय आकलन और प्रभावित ग्रामीणों की आपत्तियों पर विचार करने के बाद ही लिए जाएं।
