
पंडवानी के स्वर्णिम युग का हुआ अवसान
तीजन बाई ने रायपुर के एम्स में ली अंतिम सांस
सत्यमेव न्यूज़/रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण से सम्मानित सुप्रसिद्ध लोक कलाकार डॉ.तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित एम्स में निधन हो गया। वे 70 वर्ष की थी। पिछले कई सप्ताह से उम्र संबंधी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनका उपचार चल रहा था। एम्स प्रबंधन के अनुसार उन्होंने रविवार सुबह लगभग 3:15 बजे अंतिम सांस ली। ज्ञात हो कि डॉ.तीजन बाई का निधन केवल एक महान कलाकार का अवसान नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति के उस स्वर्णिम अध्याय का समापन है जिसने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोकगायन शैली को गांवों की चौपाल से उठाकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। अपनी ओजस्वी आवाज, प्रभावशाली अभिनय और विलक्षण मंचीय प्रस्तुति से उन्होंने महाभारत के पात्रों और प्रसंगों को इस तरह जीवंत किया कि दुनिया भर के दर्शक भारतीय लोक परंपरा के मुरीद हो गए।
तीज के दिन जन्मी थीं, इसलिए रखा गया ‘तीजन’ नाम
डॉ.तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी (अटारी क्षेत्र) में हुआ था। उनका जन्म लोकपर्व तीज के दिन हुआ, इसलिए उनके माता-पिता ने उनका नाम ‘तीजन’ रखा। यद्यपि कुछ स्थानों पर उनकी जन्मतिथि 24 अप्रैल भी दर्ज है किंतु पारिवारिक और स्थानीय परंपरा के अनुसार उनका वास्तविक जन्म तीज पर्व के दिन ही माना जाता है।
13 वर्ष की उम्र में ही रचा था लोक कला के क्षेत्र में इतिहास
तीजन बाई ने मात्र 13 वर्ष की आयु में पंडवानी गायन की सार्वजनिक प्रस्तुति देकर अपने कलात्मक जीवन की शुरुआत की। उस समय महिलाओं के लिए केवल बैठकर प्रस्तुत की जाने वाली ‘वेदमती शैली’ ही स्वीकार्य मानी जाती थी। उन्होंने सामाजिक परंपराओं और पुरुष वर्चस्व को चुनौती देते हुए ‘कापालिक शैली’ को अपनाया जिसमें कलाकार खड़े होकर तंबूरा हाथ में लेकर अभिनय, संवाद और गायन के माध्यम से महाभारत की कथा प्रस्तुत करता है। उनकी यह साहसिक पहल आगे चलकर पंडवानी की नई पहचान बनी और महिला कलाकारों के लिए अभिव्यक्ति के नए द्वार खोल गई।
गांव की चौपाल से तय किया विश्व मंच तक का सफ़र
छत्तीसगढ़ की माटी से निकली इस लोक-गायिका ने अपनी असाधारण प्रतिभा के बल पर पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने भारत सहित अनेक देशों में प्रस्तुति दी और जापान, फ्रांस सहित कई देशों के प्रतिष्ठित मंचों पर भारतीय लोककला का परचम लहराया। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के समक्ष भी अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। बता दे कि उनकी कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही बल्कि भारतीय लोक परंपरा, संस्कृति और महाभारत की कथाओं को विश्व समुदाय तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बनी।
सम्मानों से अलंकृत गौरवशाली सफर रहा तीजन बाई
भारतीय लोककला में अतुलनीय योगदान के लिए डॉ.तीजन बाई को समय-समय पर अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें वर्ष 1987 में पद्मश्री, 2003 में पद्म भूषण तथा 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया गया। इसके अलावा उन्हें जापान के प्रतिष्ठित फुकुओका कला पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय एवं वैश्विक सम्मान प्राप्त हुए।
सांस्कृतिक विरासत बनकर रहेंगी सदैव जीवित
डॉ.तीजन बाई ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि प्रतिभा सामाजिक बंधनों की मोहताज नहीं होती। उन्होंने लोककला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाया। उनका जीवन संघर्ष, साधना, साहस और सृजन का अनुपम उदाहरण है। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के सांस्कृतिक जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। उनकी ओजपूर्ण आवाज भले ही आज हमेशा के लिए मौन हो गई हो लेकिन पंडवानी की हर प्रस्तुति, महाभारत के हर प्रसंग और भारतीय लोक संस्कृति के हर मंच पर उनका नाम सदैव श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण किया जाता रहेगा।

