
करुणा से व्यंग्य और कथा से प्रतिरोध की यात्रा
‘कफन’ और ‘निठल्ले की डायरी’ का हुआ वाचन
स्थानीय साहित्यकारों ने रेखांकित की दोनों रचनाकारों की प्रासंगिकता
सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। प्रगतिशील लेखक संघ खैरागढ़ और पाठक मंच खैरागढ़ के संयुक्त तत्वावधान में ‘प्रेमचंद से परसाई तक : 2026’ साहित्यिक आयोजन का वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.जीवन यदु के निवास पर किया गया। आयोजन में मुंशी प्रेमचंद की चर्चित कहानी ‘कफन’ और हरिशंकर परसाई की ‘निठल्ले की डायरी’ को केंद्र में रखकर भारतीय समाज के बदलते स्वरूप, सामाजिक विसंगतियों और व्यवस्था की विडंबनाओं पर विचार-विमर्श किया गया। प्रगतिशील लेखक संघ खैरागढ़ के अध्यक्ष संकल्प यदु पहटिया ने कहा कि प्रेमचंद की ‘कफन’ आजादी से पहले के भारतीय समाज की तस्वीर प्रस्तुत करती है जबकि परसाई की ‘निठल्ले की डायरी’ आजादी के बाद के समाज के निठल्लेपन और उसकी मानसिकता पर तीखा व्यंग्य करती है। आधार वक्तव्य का वाचन करते हुए टीकाराम देशमुख ने कहा कि प्रेमचंद और परसाई एक-दूसरे के पूरक रचनाकार हैं। दोनों ने अपने समय की सामाजिक और व्यवस्थागत विसंगतियों पर कलम के माध्यम से प्रहार किया है। मंच के संयोजक डॉ.प्रशांत झा ने कहा कि दोनों रचनाकारों ने समाज की ऐसी कड़वी सच्चाइयों को सामने रखा, जो पाठक को भीतर तक विचलित करती हैं। विनयशरण सिंह ने कहा कि ‘प्रेमचंद से परसाई तक’ केवल दो साहित्यकारों के बीच की यात्रा नहीं है बल्कि हिंदी साहित्य में सामाजिक यथार्थ की बदलती अभिव्यक्ति की यात्रा भी है। यह यात्रा करुणा से व्यंग्य, कथा से प्रहार और संवेदना से प्रतिरोध तक पहुंचती है। दोनों रचनाकारों का अंतिम लक्ष्य मनुष्य को अधिक न्यायपूर्ण, विवेकशील और मानवीय समाज की ओर ले जाना रहा।
डॉ.जीवन यदु ने प्रेमचंद के नाम के साथ ‘मुंशी’ शब्द जुड़ने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि के.एम. मुंशी और प्रेमचंद ‘हंस’ पत्रिका का प्रकाशन करते थे। वरिष्ठता के कारण कई स्थानों पर के.एम. मुंशी का नाम पहले और प्रेमचंद का नाम बाद में लिखा जाता था। इसी क्रम में लोगों ने ‘मुंशी’ शब्द को प्रेमचंद के नाम का हिस्सा समझना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने स्वयं कभी अपने नाम के साथ ‘मुंशी’ नहीं जोड़ा। टी.ए. खान ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में व्यंग्य सूक्ष्म रूप में दिखाई देता है जबकि परसाई का व्यंग्य अधिक मुखर और प्रत्यक्ष है। रवि झोंका ने कहा कि दोनों रचनाकारों ने व्यंग्य को सामाजिक विसंगतियों को उजागर करने के प्रभावी माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। प्रेमचंद ने कथा के माध्यम से समाज की विद्रूपताओं को सामने रखा वहीं परसाई ने प्रत्यक्ष व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि गुलामी के दौर से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक गरीबी, अशिक्षा और पूंजीवादी व्यवस्था के प्रभावों ने मानवीय मूल्यों को प्रभावित किया और दोनों रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में इन स्थितियों को रेखांकित किया।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए गिरधर सिंह राजपूत ने कहा कि प्रेमचंद और परसाई की रचनाएं भारतीय समाज के सामने रास्ता दिखाने वाली मशाल की तरह हैं। यही कारण है कि बदलते समय में भी दोनों साहित्यकारों की रचनाएं अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। कार्यक्रम की शुरुआत में रवि झोंका ने प्रेमचंद की ‘कफन’ कहानी का पाठ किया। इसके बाद गिरधर सिंह राजपूत ने ‘निठल्ले की डायरी’ से ‘निठल्लेपन का दर्शन’ का पाठ किया। आयोजन में जीवेश सिंह सहित साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। आभार प्रदर्शन डॉ.प्रशांत झा ने किया।
