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श्री सीमेंट खनन के खिलाफ जनविद्रोह हुआ उग्र, 55 गांवों का अल्टीमेटम खनन समर्थक नेताओं और अधिकारियों की गांवों में एंट्री पर बैन

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। दनिया व अतरिया परिक्षेत्र में श्री सीमेंट के प्रस्तावित चूना पत्थर खनन और सीमेंट फैक्ट्री परियोजना अब सिर्फ एक औद्योगिक प्रस्ताव नहीं रही बल्कि यह जनता बनाम सिस्टम की सीधी लड़ाई में तब्दील हो चुकी है। जिले के छुईखदान ब्लॉक के 55 गांवों ने एक स्वर में ऐलान किया है कि खनन के पक्ष में खड़े नेता, अफसर और दलाल अब उनके गांवों में कदम भी नहीं रख सकेंगे। गौर करें कि यह फैसला सत्ता, प्रशासन और कंपनी गठजोड़ के खिलाफ खुला जनआक्रोश माना जा रहा है।

आर-पार की लड़ाई के मूड में उतरें ग्रामीणों ने ऐलान किया है कि संडी से जंगलपुर तक फैले 55 गांवों में जो हमारी जमीन, पानी और जंगल छीनने आएगा उसे गांव की चौखट पार नहीं करने देंगे। मामले में ग्रामीणों का सीधा कहना है कि यह प्रतिबंध किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं बल्कि
खनन लॉबी और उसके राजनीतिक व प्रशासनिक संरक्षकों पर है।

20 दिसंबर की किसान महापंचायत में सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया। अब गांव-गांव में पोस्टर, बैनर और सार्वजनिक घोषणाएं लगाकर इसे लागू कर दिया गया है। ग्रामीणों का साफ कहना है कि खनन से खेती का अंत होगा और फैक्ट्री लगने से उनके जलस्रोतों की मौत होगी। परियोजना लागू होने से आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा इसलिए अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं है।

ग्रामीणों ने जिले के दो वरिष्ठ अधिकारियों पर सीधा और गंभीर आरोप लगाया है कि वे निजी कंपनी की प्रेस वार्ता में शामिल हुए और कंपनी के पक्ष में खुले मंच से बयान दिए। इसे लेकर ग्रामीणों का कहना है कि जब अफसर ही कंपनी की भाषा बोलेंगे तो किसान न्याय की उम्मीद किससे करेंगे?

खनन रोकने ग्रामीणों का आंदोलन अनवरत चल रहा है। पहले 6 दिसंबर को छुईखदान में हजारों किसानों की ट्रैक्टर रैली हुई फिर 11 दिसंबर को दबाव में आकर जनसुनवाई रद्द की गई है और अब गांव प्रवेश प्रतिबंध को आंदोलन का अगला और निर्णायक चरण माना जा रहा है। प्रभावित ग्रामीणों की सीधी मांग है कि परियोजना रद्द करो नहीं तो संघर्ष झेलो। इसे लेकर ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि खनन और सीमेंट फैक्ट्री परियोजना स्थायी रूप से रद्द नहीं की गई तो आंदोलन होगा और जिले से निकलकर राज्यस्तरीय जन आंदोलन में बदलेगा। ग्रामीणों के अनुसार खनन शुरू होते ही सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन बंजर होगी। भूमिगत जल समाप्त होगा। नदियां, नाले और जंगल खत्म होंगे और इसका खामियाजा सिर्फ आज नहीं आने वाली पीढ़ियां भी भुगतेंगी। मामले में किसान अधिकार संघर्ष समिति की अध्यक्ष लुकेश्वरी जंघेल ने बयान दिया है कि यह लड़ाई अब कागजों की नहीं रही जमीन की है। अगर खनन थोपा गया तो गांव-गांव से प्रतिरोध खड़ा होगा। संरक्षक गिरवर जंघेल ने कहा है कि हम विकास के खिलाफ नहीं विनाश के खिलाफ हैं। बच्चों का भविष्य गिरवी रखकर कोई फैक्ट्री हमें मंजूर नहीं। अब यह आंदोलन नहीं जनआंदोलन है। इस संघर्ष को साहू समाज, लोधी समाज, कोसरिया यादव महासभा, ओबीसी महासंघ सहित कई संगठनों का खुला समर्थन मिल चुका है।
साफ है कि यह लड़ाई अब कुछ गांवों की नहीं पूरे क्षेत्र के अस्तित्व की बन चुकी है। दूसरी ओर ग्रामीणों के उग्र रवैय्ये को देखकर श्री सीमेंट फैक्ट्री के लोग बहरहाल जिले में नजर नहीं आ रहे हैं और खनन शुरू करने को लेकर शासन एवं प्रशासन के प्रतिनिधियों के तरफ से भी कोई बयानबाजी सामने नहीं आ रही है।

Satyamev News

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