
मिट्टी के रावण वध की ऐतिहासिक परंपरा का राजा गिरिराज किशोर ने किया निर्वहन
30 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन
रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां
छुईखदान। शहीद नगरी छुईखदान में मंगलवार को दशहरा पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों, धार्मिक आस्था और अपार उत्साह के साथ धूमधाम से मनाया गया। असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक दशहरा पर्व पर पूरा नगर उत्सव के रंग में रंगा नजर आया। नगर में सुबह से ही पर्व को लेकर चहल-पहल शुरू हो गई थी। बाजारों में दुकानदारों ने अपनी दुकानें सजाईं, वहीं शाम होते-होते दशहरा उत्सव देखने के लिए नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचने लगे। रावण वध, पुतला दहन और रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने आयोजन को यादगार बना दिया। छुईखदान का दशहरा केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं बल्कि यहां की ऐतिहासिक पहचान और रियासतकालीन सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्षों से चली आ रही परंपराओं के कारण इस पर्व का नगरवासियों के बीच विशेष महत्व है यही वजह रही कि दशहरा उत्सव को लेकर लोगों में सुबह से ही खासा उत्साह देखने को मिला। परिवार सहित पहुंचे लोगों ने पर्व का आनंद लिया और एक-दूसरे को दशहरे की शुभकामनाएं देकर खुशियां साझा कीं।
रियासतकालीन परंपरा के अनुरूप निकली राजा की शाही सवारी
छुईखदान रियासत में मिट्टी के रावण वध की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इस ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन करते हुए राजा गिरिराज किशोर मंगलवार शाम अपने महल से मिट्टी के रावण वध के लिए निकले। उनके साथ बड़ी संख्या में नगर के नागरिकों और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोगों की सहभागिता रही। पारंपरिक स्वरूप में संपन्न हुई इस रस्म ने छुईखदान की ऐतिहासिक पहचान को एक बार फिर जीवंत कर दिया।राजा के महल से निकलने के साथ ही नगर में दशहरा उत्सव का माहौल और अधिक उत्साहपूर्ण हो गया। रियासतकाल से जुड़ी इस परंपरा को देखने के लिए लोग उत्सुक नजर आए। स्थानीय नागरिकों के लिए यह आयोजन अपनी ऐतिहासिक जड़ों, पुरानी मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का अवसर भी रहा। मिट्टी के रावण वध की परंपरा छुईखदान के दशहरे को विशिष्ट पहचान प्रदान करती है, जिसका निर्वहन आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जा रहा है।
फुटबॉल मैदान में 30 फीट ऊंचे रावण का हुआ दहन
रियासतकालीन परंपरा के निर्वहन के पश्चात फुटबॉल मैदान में मुख्य दशहरा उत्सव का आयोजन किया गया। रास गरबा एवं दशहरा समिति तथा नगर पंचायत के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में 30 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया गया। जैसे ही रावण का पुतला अग्नि की लपटों में समाया, मैदान में उपस्थित लोगों ने जय श्रीराम के जयकारे लगाए। पूरा परिसर धार्मिक उत्साह और उल्लास से गूंज उठा। रावण दहन देखने के लिए मैदान में नगरवासियों के साथ बड़ी संख्या में ग्रामीण भी मौजूद रहे। बच्चों में रावण के विशाल पुतले को लेकर विशेष उत्सुकता दिखाई दी वहीं युवा और बुजुर्ग भी पूरे उत्साह के साथ आयोजन का हिस्सा बने। लोगों ने परिवार सहित उपस्थित होकर इस पारंपरिक पर्व का आनंद लिया। रावण दहन के साथ ही बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश जन-जन तक पहुंचा। दशहरा पर्व भारतीय संस्कृति में धर्म, सत्य, मर्यादा और सदाचार के महत्व को रेखांकित करता है। रावण दहन के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि अहंकार, अन्याय और बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः सत्य और सदाचार की ही विजय होती है। छुईखदान में आयोजित दशहरा उत्सव ने इसी सांस्कृतिक और नैतिक संदेश को लोगों के बीच प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। इस अवसर पर राजा गिरिराज किशोर ने छुईखदान नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोगों को दशहरा पर्व की शुभकामनाएं दीं। पर्व के दौरान नगरवासियों और ग्रामीणों की सहभागिता ने आयोजन को सामूहिक उत्सव का स्वरूप प्रदान किया। लोगों ने पारंपरिक आयोजन में भाग लेकर आपसी सौहार्द, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का परिचय दिया। छुईखदान में दशहरा पर्व का आयोजन स्थानीय परंपराओं को सहेजने और नई पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक विरासत से परिचित कराने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा। रियासतकालीन मिट्टी के रावण वध की रस्म और सार्वजनिक रूप से रावण दहन की परंपरा ने आयोजन को विशिष्ट बनाया। इस अवसर पर नगर और ग्रामीण अंचल के लोगों की उपस्थिति ने यह दर्शाया कि दशहरा आज भी सामाजिक मेल-मिलाप और सामूहिक उल्लास का प्रमुख पर्व है।
रंगसंध्या रायपुर की प्रस्तुतियों ने बांधा समां
दशहरा उत्सव के अंतर्गत रावण दहन के पश्चात रंग संध्या रायपुर द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। रंगारंग प्रस्तुतियों ने आयोजन में चार चांद लगा दिए। कार्यक्रम का आनंद लेने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे। धार्मिक उत्सव के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन ने लोगों को मनोरंजन का अवसर दिया और पूरे वातावरण को उत्सवमय बनाए रखा। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के दौरान दर्शकों में उत्साह देखने को मिला। नगर में देर रात तक लोगों की आवाजाही बनी रही। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने दशहरा पर्व की खुशियों में भागीदारी निभाई। धार्मिक आयोजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के इस संगम ने छुईखदान के दशहरे को आकर्षक और यादगार स्वरूप प्रदान किया।
परंपरा, आस्था और सामाजिक एकता का बना संगम
छुईखदान का दशहरा उत्सव अपनी ऐतिहासिक परंपरा, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विविधता के लिए विशेष पहचान रखता है। यहां मिट्टी के रावण वध की रियासतकालीन परंपरा का निर्वहन और फुटबॉल मैदान में विशाल रावण के पुतले का दहन, दोनों ही आयोजन पर्व के महत्व को बढ़ाते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से नगर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने के साथ-साथ लोगों में आपसी सद्भाव और एकता की भावना भी मजबूत होती है। मंगलवार को आयोजित दशहरा पर्व में नगरवासियों और ग्रामीणों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने आयोजन को सफल और यादगार बनाया। रावण दहन के दौरान गूंजते जय श्रीराम के जयकारे, पारंपरिक रस्मों के प्रति लोगों की आस्था और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रौनक पूरे आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही। इस तरह छुईखदान में दशहरा पर्व धार्मिक श्रद्धा, पारंपरिक गौरव और सांस्कृतिक उल्लास के साथ संपन्न हुआ। वर्षों पुरानी परंपराओं के निर्वहन ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि किसी भी क्षेत्र की वास्तविक पहचान उसकी संस्कृति, इतिहास और सामाजिक एकजुटता में निहित होती है। छुईखदान का दशहरा उत्सव इसी विरासत को सहेजते हुए नगर की सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बना।




