
सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग एवं साहित्य परिषद के तत्वावधान में मार्च माह की पाठ्येतर गतिविधि के अंतर्गत लोक एवं हिन्दी साहित्य में फाग विषय पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में फाग की परंपरा साहित्यिक महत्त्व और सांस्कृतिक स्वरूप पर विस्तृत चर्चा की गई। अध्यक्षता हिन्दी विभाग एवं कला संकाय के अध्यक्ष प्रो.राजन यादव ने की। संचालन साहित्य परिषद के सचिव समीरचंद ने किया। इस अवसर पर सहप्राध्यापक डॉ.देवमाईत मिंज, डॉ.पूर्णिमा केलकर, अतिथि व्याख्याता डॉ.कुमुद रंजन मिश्र सहित विभाग के शोधार्थी तथा एम.ए. बी.पी.ए. और बी.ए. के विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत इंदु यादव एम.ए. हिन्दी द्वारा फाग की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए आज बिरज में होरी रे रसिया की प्रस्तुति से हुई। इसके बाद शैलकुमारी एम.ए. हिन्दी ने अवध की होली पर आधारित छत्तीसगढ़ी फाग गीत अवध में बाजे नगारा दस जोरी प्रस्तुत किया। वर्षा देवांगन ने ईसुरी के फाग गीतों का पाठ किया वहीं कामता प्रसाद ने लक्ष्मण मस्तूरिया के छत्तीसगढ़ी फाग आगे फागुन रंग भरके के माध्यम से प्रकृति के सौंदर्य का चित्रण किया। निखिल डोंगरे बी.पी.ए. द्वितीय सेमेस्टर ने वर्तमान समय में होली के त्योहार में आ रही विकृतियों पर चिंता व्यक्त की जबकि सुधाररंजना मांडवी ने प्रकृति और फाग के अंतर्संबंधों तथा केमिकल रंगों के दुष्प्रभाव पर विचार रखे। डॉ.कुमुद रंजन मिश्र ने हिन्दी साहित्य में फाग की परंपरा पर अपने विचार रखते हुए बताया कि आदिकाल के जैन साहित्य से लेकर रीति और आधुनिक काल तक फाग की परंपरा निरंतर रही है। उन्होंने रीतिकालीन कवि नज़ीर अकबराबादी की कविताओं जब फागुन झमकते हों और फकीरों की होली का उल्लेख किया। डॉ.पूर्णिमा केलकर ने फाग की शास्त्रीय परंपरा पर प्रकाश डालते हुए संस्कृत और प्राकृत के फाग गीतों की विशेषताओं का उल्लेख किया तथा धमार गीत राजमन खेले होली की प्रस्तुति दी। उन्होंने कहा कि होली आपसी प्रेम, सौहार्द और समझ का पर्व है। डॉ.देवमाईत मिंज ने फाग के पौराणिक संदर्भों पर चर्चा करते हुए सूरदास की रचनाओं में होली के वर्णन और लोक परंपराओं में इसके विभिन्न रूपों को रेखांकित किया। उन्होंने फाग गीतों की तुलना सरहुल गीतों से करते हुए इसे प्रकृति के बहुरंग का उत्सव बताया। अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो.राजन यादव ने फाग को ऋतु चक्र का उत्सव गीत बताया। उन्होंने कृष्ण भक्त कवियों की रचनाओं में राधा-कृष्ण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए सूरदास और रसखान की काव्य परंपरा पर प्रकाश डाला साथ ही रीतिकालीन कवि पद्माकर की पंक्ति ललन फिर आइयो खेलन होरी के माध्यम से साहित्य में होली के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने युवाओं से हुड़दंग से दूर रहकर प्रकृति के साथ होली खेलने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया। कार्यक्रम के अंत में हिन्दी साहित्य परिषद की अध्यक्ष दीपाक्षी मेश्राम ने उपस्थित गुरुजनों विद्यार्थियों शोधार्थियों और मंच संचालक का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर साहित्य परिषद की उपाध्यक्ष सरिता मरकाम सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन अबीर-गुलाल के साथ हुआ।