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इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में पुरालिपि एवं पुरालेख अध्ययन पर कार्यशाला संपन्न

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। पुरालिपि एवं पुरालेख अध्ययन पर केंद्रित सात दिवसीय कार्यशाला का समापन 22 फरवरी को विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक दरबार हॉल में हुआ। प्राचीन अभिलेखविद्या को समर्पित इस ज्ञानवर्धक आयोजन में विद्यार्थियों शोधार्थियों और विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी रही। समापन समारोह की मुख्य अतिथि कुलपति प्रो.डॉ. लवली शर्मा रहीं जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. राजन यादव ने की। विषय विशेषज्ञ के रूप में भूतपूर्व निदेशक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण मैसूर से डॉ.टी.एस. रविशंकर उपस्थित रहे कार्यक्रम का प्रारंभ सुष्मिता चौधरी के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने अतिथियों को देवी सरस्वती के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ करने हेतु आमंत्रित किया। कुलपति प्रो.डॉ. लवली शर्मा ने अपने संबोधन में कार्यशाला को विद्यार्थियों के लिए अत्यंत प्रेरक बताया। उन्होंने डॉ. रविशंकर की विद्वत्ता और मार्गदर्शन की सराहना करते हुए भविष्य में भी ऐसे विशेषज्ञों को आमंत्रित करने की इच्छा व्यक्त की। साथ ही विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता के लिए आभार प्रकट किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. राजन यादव ने आचार्य दंडी के श्लोक का उल्लेख करते हुए शब्द की प्रकाशमान शक्ति पर प्रकाश डाला उन्होंने कहा कि अभिलेखविद्या ऐसी प्रमाणिक विधा है जिसे असत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता। अनेक आक्रमणों के बावजूद भारतीय इतिहास की गरिमा अक्षुण्ण बनी हुई है। विद्यार्थियों को इतिहास के गंभीर अध्ययन के लिए प्रेरित करते हुए उन्होंने गति ही जीवन है का संदेश दिया। विशेषज्ञ डॉ. टी.एस. रविशंकर ने कहा कि यह कार्यशाला केवल औपचारिक आयोजन नहीं रही बल्कि इसे सभी ने एक उत्सव के रूप में अनुभव किया। विद्यार्थियों की संगीतमय प्रस्तुतियों और स्नेहपूर्ण उपहारों से वे भावुक हुए। उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर के शांत एवं रमणीय वातावरण की प्रशंसा करते हुए विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे सीखी गई विद्या का निरंतर अभ्यास करें।

समापन सत्र में प्रतिभागियों को अपने अनुभव व्यक्त करने का अवसर दिया गया। शरद स्वर्णकार, देवहूति साहू, कृष्ण कुमार नेताम, रामेश्वरी, शिवांगी रावत, प्रखर चौरे, नैन्सी अग्रवाल, श्रुति, धरनी वर्मा और सोनल वसानी सहित अनेक विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने कार्यशाला को सुव्यवस्थित ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी बताया। सभी ने डॉ. टी.एस. रविशंकर की निष्ठा समर्पण और गहन अध्ययनशीलता की सराहना की। बी.एफ.ए. द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों ने सम्मानस्वरूप डॉ. रविशंकर को उपहार भेंट किए। प्रशांत साहरे ने अपने विचार रखते हुए कहा कि लंबे समय से वे इस विद्या को सीखने के इच्छुक थे जो इस कार्यशाला के माध्यम से संभव हो सका। कार्यक्रम के दौरान पूर्णिमा केलकर ने आज जाने की ज़िद न करो गीत का संस्कृत रूप में मधुर गायन प्रस्तुत किया जिसने वातावरण को भावुक बना दिया। उन्होंने डॉ. रविशंकर की तुलना प्राचीन ऋषि से करते हुए अभिलेखविद्या की शोध प्रविधि से जुड़ी शैक्षणिक महत्ता को रेखांकित किया। कार्यशाला के संयोजक डॉ. आशुतोष चौरे ने बताया कि प्रारंभ में उन्हें आयोजन की प्रतिक्रिया को लेकर संशय था किंतु विद्यार्थियों की उत्साही भागीदारी ने इसे सफल बना दिया। उन्होंने कहा कि डॉ. रविशंकर ने सभी के लिए इतिहास की नई दृष्टि का द्वार खोला। अंत में उन्होंने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। समापन अवसर पर कुलपति द्वारा प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए।

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