73 साल पहले जिस ट्रेजरी को बचाने के लिए चली थीं गोलियां, आज फिर वही सवाल: क्या मुख्यमंत्री का भी आश्वासन रह गया अधूरा?

विभाग के पलायन के बाद 1953 के शहीदों की यादें हुई ताजा
उपकोषालय का काम खैरागढ़ स्थानांतरित होने से क्षेत्र में आक्रोश
जनभावनाओं और सरकारी फैसले के बीच उठे कई सवाल
सत्यमेव न्यूज छुईखदान। जिले के ऐतिहासिक नगर छुईखदान में उपकोषालय (ट्रेजरी) के कार्यों के खैरागढ़ स्थानांतरित होने से क्षेत्र में असंतोष गहराने लगा है। यह मामला अब केवल एक सरकारी कार्यालय के स्थानांतरण तक सीमित नहीं है बल्कि उस ऐतिहासिक विरासत से भी जुड़ा है जिसके लिए 73 वर्ष पहले पांच नागरिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था। यही कारण है कि एक बार फिर ट्रेजरी का मुद्दा स्थानीय जनभावनाओं के केंद्र में आ गया है। करीब दो माह पूर्व सुशासन तिहार के दौरान आयोजित जन चौपाल में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सार्वजनिक मंच से घोषणा की थी कि छुईखदान की ट्रेजरी कहीं नहीं जाएगी और यथावत छुईखदान में ही संचालित होगी। मुख्यमंत्री के इस आश्वासन के बाद क्षेत्रवासियों में यह विश्वास जगा था कि नगर की ऐतिहासिक पहचान और प्रशासनिक गरिमा सुरक्षित रहेगी लेकिन अब ट्रेजरी से जुड़े कार्यों के खैरागढ़ स्थानांतरित होने से लोगों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि आखिर मुख्यमंत्री की घोषणा का क्या हुआ।
क्षेत्रवासियों की बढ़ी परेशानी, हर काम के लिए खैरागढ़ जाना पड़ रहा
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि ट्रेजरी से संबंधित अधिकांश कार्य अब छुईखदान में नहीं हो रहे हैं। सरकारी कर्मचारी, पेंशनभोगी, ठेकेदार और आम नागरिकों को अपने छोटे-बड़े कार्यों के लिए खैरागढ़ जाना पड़ रहा है। इससे समय, आर्थिक व्यय और श्रम- तीनों की अतिरिक्त हानि हो रही है। लोगों का मानना है कि प्रशासनिक सुविधा के बजाय यह निर्णय आम नागरिकों की परेशानियां बढ़ाने वाला साबित हो रहा है।
मुख्यमंत्री के आश्वासन और वर्तमान स्थिति के बीच विरोधाभास
क्षेत्र के नागरिकों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक मंच से ट्रेजरी को यथावत रखने की घोषणा की थी तो उसके बाद ऐसा क्या हुआ कि स्थिति इसके विपरीत हो गई। क्या मुख्यमंत्री के निर्देशों का पालन नहीं हुआ अथवा बाद में कोई प्रशासनिक निर्णय लिया गया जिसने मुख्यमंत्री की ही घोषणा को अप्रभावी बना दिया? इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर अब जनता सरकार और प्रशासन से चाहती है।

1953 का वह आंदोलन जिसने छुईखदान को बनाया ‘शहीद नगरी’
छुईखदान का इतिहास ट्रेजरी से गहराई से जुड़ा हुआ है। स्थानीय इतिहास के अनुसार 9 जनवरी 1953 को तत्कालीन ट्रेजरी को खैरागढ़ में विलय किए जाने के विरोध में व्यापक जनआंदोलन हुआ था। आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में पांच नागरिक वीरगति को प्राप्त हुए। उनके सर्वोच्च बलिदान के कारण ही छुईखदान को “शहीद नगरी” की पहचान मिली। आज भी प्रत्येक वर्ष 9 जनवरी को शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जहां जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक संगठन और नागरिक शहीदों को नमन करते हैं लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने उन ऐतिहासिक घटनाओं की यादें फिर से ताजा कर दी हैं।
73 वर्ष बाद फिर वही सवाल, क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
मामले की गंभीरता से जुड़े क्षेत्रवासियों का कहना है कि जिस ट्रेजरी को बचाने के लिए कभी लोगों ने गोलियां खाईं और अपने प्राणों की आहुति दी थी वही ट्रेजरी आज फिर छुईखदान से दूर होती दिखाई दे रही है। नागरिकों का मानना है कि शहीदों के सम्मान का अर्थ केवल स्मारकों पर पुष्पांजलि अर्पित करना नहीं बल्कि उनके संघर्ष से जुड़ी संस्थाओं और ऐतिहासिक पहचान को भी सुरक्षित रखना है। क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यदि जनभावनाओं की अनदेखी जारी रही तो भविष्य में इस मुद्दे को लेकर व्यापक जनआंदोलन खड़ा हो सकता है। नागरिकों का कहना है कि ट्रेजरी केवल एक कार्यालय नहीं बल्कि छुईखदान के स्वाभिमान, इतिहास और प्रशासनिक अस्तित्व का प्रतीक है।
जनता की मांग: साय सरकार स्पष्ट करे अपना रुख
क्षेत्रवासियों ने सरकार से मांग की है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय द्वारा दिए गए सार्वजनिक आश्वासन और वर्तमान स्थिति के बीच उत्पन्न विरोधाभास पर स्पष्ट जवाब दिया जाए। साथ ही छुईखदान के ऐतिहासिक महत्व, शहीदों के बलिदान और स्थानीय जनभावनाओं का सम्मान करते हुए उपकोषालय (ट्रेजरी) को पुनः छुईखदान में पूर्ण रूप से संचालित करने की दिशा में पहल की जाए।