318 वर्ष पुरानी आस्था का महापर्व: पांडादाह में आज निकलेगी भगवान जगन्नाथ की भव्य यात्रा

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (केसीजी) जिले के ऐतिहासिक ग्राम पांडादाह में गुरुवार 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ की ऐतिहासिक यात्रा श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में निकलेगी। लगभग 318 वर्ष पुराने जगन्नाथ मंदिर में आयोजित होने वाला यह महापर्व न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि अविभाजित राजनांदगांव अंचल की सबसे बड़ी धार्मिक परंपराओं में से एक माना जाता है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहां भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस वर्ष भी दोपहर 12 बजे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा मंदिर से बाहर विराजमान होंगे। मंदिर के पुरोहित परिवार के सदस्य पंडित उज्जवल दत्त झा तीनों विग्रहों को अपने कंधों पर धारण कर मंदिर परिसर की परिक्रमा कराएंगे। इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं के “जय जगन्नाथ” के उद्घोष, शंखनाद और पुष्पवर्षा के बीच पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में डूब जाएगा। यह अलौकिक दृश्य इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा माना जाता है।

इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार पांडादाह का जगन्नाथ मंदिर अविभाजित मध्यप्रदेश का पहला एवं प्रदेश के सबसे प्राचीन जगन्नाथ मंदिरों में शामिल है। इसका निर्माण वर्ष 1707 में कराया गया था। मंदिर का स्थापत्य पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की परंपरा से प्रेरित माना जाता है। सदियों से यहां विवाह, संतान प्राप्ति तथा मनोकामना पूर्ति के लिए श्रद्धालु दर्शन करने आते रहे हैं। मंदिर सेवा समिति के अध्यक्ष पंडित मिहिर झा बताते हैं कि कल्चुरी शासन के पतन के बाद भोसले शासनकाल में महंत प्रहलाद दास ने इस मंदिर के निर्माण की शुरुआत की थी। उनके निधन के बाद उनके शिष्य महंत हरिदास बैरागी ने मंदिर का विस्तार कराया। बाद में बैरागी परंपरा के महंतों ने राजनांदगांव रियासत के शासन का दायित्व भी संभाला और पांडादाह लंबे समय तक रियासत की राजधानी के रूप में भी प्रतिष्ठित रहा।

पांडादाह की रथ यात्रा देश के अन्य जगन्नाथ मंदिरों से अलग है। स्थानीय मान्यता के अनुसार महंत हरिदास बैरागी को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में आदेश दिया था कि उन्हें रथ पर नहीं बल्कि कंधों पर विराजमान कर मंदिर परिसर की परिक्रमा कराई जाए। तभी से यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यात्रा रथ के स्थान पर पुरोहित परिवार के कंधों पर निकलती है। स्थानीय लोककथा के अनुसार एक बार ब्रिटिश शासनकाल में एक अंग्रेज अधिकारी के आग्रह पर भगवान को रथ में बैठाकर यात्रा निकाली गई थी, लेकिन अगले ही दिन उस अधिकारी की मृत्यु हो गई। इसके बाद से यह परंपरा फिर कभी नहीं बदली और आज भी भगवान की कंधों पर ही परिक्रमा कराई जाती है।

रथ यात्रा केवल एक दिन का धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र का लोकपर्व है। पांडादाह और आसपास के गांवों में तीन दिनों तक घरों में दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं, गोबर से आंगन लीपे जाते हैं और रंगोलियां सजाई जाती हैं। पूरा क्षेत्र दीपोत्सव जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और अगले वर्ष श्रद्धालु पुनः धन्यवाद अर्पित करने यहां पहुंचते हैं।

मंदिर सेवा समिति ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। हरियाणा के एक कृषक परिवार द्वारा निशुल्क हलवा-पूरी महाप्रसाद का वितरण किया जाएगा। समिति के सभी स्वयंसेवक पीले वस्त्र धारण कर सेवा में तैनात रहेंगे। श्रद्धालुओं की सहायता के लिए हेल्पलाइन एवं स्वयंसेवी दल भी सक्रिय रहेंगे।

प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे पांडादाह में धार्मिक विरासत के साथ पर्यटन की भी अपार संभावनाएं हैं। यहां ऐतिहासिक जगन्नाथ मंदिर के अलावा प्राचीन त्रिकोणीय कुआं, विशाल तालाब, संगमरमर की प्राचीन मूर्तियां, आमनेर नदी का मनोरम तट, सियारसुरी मंदिर और समीप स्थित महामाया मंदिर प्रमुख आकर्षण हैं। इतिहासकारों के अनुसार महाभारत काल में पांडवों के विश्राम से जुड़े संदर्भों के कारण इस स्थान का प्राचीन नाम पांडवदाह था, जो समय के साथ परिवर्तित होकर पांडादाह हो गया। मंदिर सेवा समिति के अध्यक्ष पंडित मिहिर झा ने सभी श्रद्धालुओं से परिवार सहित रथ यात्रा महापर्व में शामिल होकर भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त करने की अपील की है। उनका कहना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और लोकआस्था का जीवंत उत्सव है, जिसे देखने और अनुभव करने देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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