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2 साल की मासूम बेटी की लाश सीने से लगाए रोते-बिलखते रहे माता-पिता, अंतिम संस्कार के लिए बस में तय किया अंतिम सफर

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़. गीत संगीत और नृत्य से जीवन को आल्हादित करने वाले संगीत नगरी खैरागढ़ से एक हृदयविदारक मामला सामने आया है जिसने न केवल सरकारी संवेदनहीनता बल्कि सामाजिक संकीर्णता की परतें भी उधेड़ दी हैं। जिला मुख्यालय खैरागढ़ के नगर पालिका क्षेत्र के वार्ड क्र. 03 मोंगरा निवासी गौतम डोंगरे और उनकी पत्नी कृति डोंगरे रोज़ी-रोटी के लिए हैदराबाद में मजदूरी करते थे। हाल ही में उनकी दो वर्षीय बेटी बीमार हुई तो दंपति ने उसे लेकर छत्तीसगढ़ लौटने का निर्णय लिया लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। हैदराबाद रेलवे स्टेशन से छूटी ट्रेन में ही बच्ची ने पिता की गोद में दम तोड़ दिया। इसके बाद जैसे-तैसे राजनांदगांव रेलवे स्टेशन पर उतरकर गौतम ने सरकार की ‘मुक्तांजलि शव वाहन सेवा’ से मदद मांगी ताकि अपनी बेटी वेदिका का शव खैरागढ़ मोंगरा तक ले जाया जा सके लेकिन

जवाब मिला यह सुविधा सिर्फ सरकारी अस्पताल में हुई मृत्यु पर लागू होती है और बड़ा सवाल यह है कि क्या मौत सिर्फ अस्पताल की दीवारों के भीतर ही सम्मान के योग्य मानी जाएगी? क्या एक पिता की बेबसी सरकारी नियमों से टकराकर लौट जानी चाहिए? सरकारी सहायता न मिलने पर मासूम वेदिका के पिता गौतम और माता कृति ने बेटी की लाश को सीने से लगाकर आम बस से खैरागढ़ तक का सफर किया। यह यात्रा सिर्फ दूरी तय करने की नहीं थी बल्कि लाचारी, टूटे सपनों और बेजुबान सवालों से भरी हुई थी। खैरागढ़ पहुंचने पर बेबस माता-पिता को बस स्टैंड पर समाजसेवी हरजीत सिंह मिले और हरजीत ने न केवल परिवार को उनके घर तक पहुंचाया बल्कि अंतिम संस्कार होने तक साथ निभाकर इंसानियत की मिसाल पेश की।

गौतम का सबसे बड़ा अपराध यह निकला कि उसने अपने ही गांव की लड़की से प्रेम विवाह किया। जातीय बंधनों और संकीर्ण परंपराओं में जकड़े समाज ने उन्हें सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दिया। मासूम बेटी की मौत पर भी वार्ड का कोई व्यक्ति शोक साझा करने नहीं आया और अंतिम संस्कार में केवल गौतम, उनके ससुर, मदद करने वाले हरजीत सिंह, जगदीश साहू और राजकुमार साहू मौजूद थे।

गौतम डोंगरे की मासूम बेटी अब इस दुनिया में नहीं रही लेकिन उसकी मौत के बाद व्यवस्था ने दो गहरे सवाल छोड़ दिए हैं। क्या गरीब और बहिष्कृत परिवार को मरने के बाद भी सम्मान का हक नहीं?
क्या 21वीं सदी के भारत में प्रेम विवाह अब भी सामाजिक अपराध है? सरकार की मुक्तांजलि योजना का दावा है कि यह अंतिम यात्रा में सरकार की सहभागिता का प्रतीक है लेकिन अगर योजना सिर्फ कागज़ी मौत मानकर चलती है और इंसान की गरिमा परिस्थितियों पर निर्भर कर दी जाती है तो इसकी प्रासंगिकता ही प्रश्नों के घेरे में है।
मासूम की चिता भले बुझ गई हो लेकिन उसके साथ उठे सवाल आज भी जल रहे हैं, क्या यही है हमारी सभ्यता और संवेदनशीलता जिस पर हमें गर्व है?

Satyamev News

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