
दो राजनीतिक पार्टियों की सरकारे बदली लेकिन जनहित में मजदूरों को नहीं मिल पाया फायदा
चुनावी घोषणा के बाद कमरे में बंद रह गई योजना
सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही का एक मामला खैरागढ़ जनपद पंचायत में सामने आया है। मुख्यमंत्री मनरेगा मजदूर टिफिन वितरण योजना के तहत वर्ष 2016-17 में 30 दिन या उससे अधिक रोजगार प्राप्त करने वाले मनरेगा श्रमिक परिवारों को टिफिन डिब्बे वितरित किए जाने थे। इसके लिए राज्य शासन से जनपद पंचायत खैरागढ़ को 15,220 टिफिन डिब्बे प्राप्त हुए थे जिनमें से 9,360 का वितरण कर दिया गया जबकि 5,860 टिफिन आज भी वितरण की प्रतीक्षा में पड़े हैं। बताया जाता है कि वर्ष 2018 में विधानसभा चुनाव के दौरान लागू आदर्श आचार संहिता के कारण वितरण प्रक्रिया रुक गई थी। इसके बाद राज्य में सरकारें और अधिकारी बदलते रहे, लेकिन शेष टिफिन पात्र हितग्राहियों तक नहीं पहुंच सके। वित्तीय वर्ष 2026-27 चल रहा है, लेकिन लगभग एक दशक बाद भी हजारों मनरेगा मजदूर योजना के लाभ से वंचित हैं। वर्षों से ये टिफिन जनपद पंचायत परिसर स्थित सरपंच सदन में रखे हुए हैं। पंचायत प्रतिनिधियों के बैठने और बैठकों के लिए बनाए गए इस भवन का उपयोग अब गोदाम के रूप में हो रहा है जिससे सरपंचों और जनप्रतिनिधियों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में हुई सरपंच संघ की बैठक में भी यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। बैठक में मांग की गई कि पात्र हितग्राहियों की सूची का सत्यापन कर शीघ्र टिफिन वितरित किए जाएं अथवा नियमानुसार उनका निस्तारण कर सरपंच सदन को उसके मूल उद्देश्य के लिए खाली कराया जाए। जनपद पंचायत के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2018 में शेष टिफिन वितरण को लेकर कलेक्टर एवं जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से मार्गदर्शन मांगा गया था लेकिन अब तक इस संबंध में अंतिम निर्णय नहीं हो सका। परिणामस्वरूप सरकारी सामग्री वर्षों से गोदाम में धूल खा रही है। इस संबंध में जनपद पंचायत खैरागढ़ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी हिमांशु गुप्ता ने कहा कि यह मामला उनके कार्यभार संभालने से पहले का है। उन्होंने बताया कि पूरे रिकॉर्ड की जांच और संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेने के बाद ही विस्तृत जानकारी दी जा सकेगी।
करीब दस वर्षों से लंबित है यह मामला
सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और पात्र हितग्राहियों तक लाभ पहुंचाने की व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि वह इस मामले में क्या निर्णय लेकर मनरेगा मजदूरों का लंबित अधिकार दिलाने और सरपंच सदन को उसके वास्तविक उपयोग के लिए मुक्त कराने की दिशा में पहल करता है।