सितार के सुर, कथक की भावाभिव्यक्ति और पंथी की थाप से सजी खैरागढ़ विश्वविद्यालय के स्थापना की सांस्कृतिक संध्या
विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस पर शास्त्रीय संगीत और छत्तीसगढ़ी लोककला का संगम
रात पौने 10 बजे तक प्रस्तुतियों में डूबे रहे दर्शक
खैरागढ़। राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस समारोह में शास्त्रीय संगीत, भारतीय नृत्य परंपरा और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति का मनोहारी संगम देखने को मिला। सितार की मधुर तानों, कथक की भावपूर्ण मुद्राओं और पंथी नृत्य की ऊर्जावान थाप ने सांस्कृतिक संध्या को यादगार बना दिया। मुंबई के प्रख्यात सितार वादक डॉ.जुनैन हलीम जाफर खान, इंदौर की कथक नृत्यांगना डॉ.सुचित्रा हरमलकर तथा पद्मश्री डॉ.राधेश्याम बारले और उनके दल की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। संगीत, नृत्य और लोककला से सजी यह संध्या रात करीब 9:45 बजे तक जारी रही।
राग हमीर की तानों से झंकृत हुआ सभागार
सांस्कृतिक कार्यक्रम का आरंभ डॉ.जुनैन हलीम जाफर खान के सितार वादन से हुआ। उन्होंने राग हमीर की मधुर तानों के साथ रूपक और तीनताल में गत प्रस्तुत कर शास्त्रीय संगीत की बारीकियों और अपनी वादन कला का परिचय दिया। सितार के तारों से निकलती सुरलहरियों और लयकारी ने वातावरण को संगीतमय बना दिया। तबले पर डॉ.हरिओम हरि ने प्रभावशाली संगत कर प्रस्तुति में सुर और ताल का सुंदर सामंजस्य स्थापित किया। शास्त्रीय संगीत की इस प्रस्तुति ने श्रोताओं को भारतीय वाद्य संगीत की समृद्ध परंपरा से रूबरू कराया।
कथक में जीवंत हुआ सीता स्वयंवर का प्रसंग
सितार वादन के बाद इंदौर की कथक नृत्यांगना डॉ.सुचित्रा हरमलकर ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को आकर्षित किया। तीनताल की बंदिशों में लय, पद संचालन, चक्कर और भावाभिव्यक्ति का सुंदर संयोजन देखने को मिला। विशेष रूप से सीता स्वयंवर के पौराणिक प्रसंग को कथक की भावभंगिमाओं के माध्यम से साकार कर उन्होंने शास्त्रीय नृत्य की अभिव्यक्ति क्षमता को मंच पर जीवंत किया। उनकी प्रस्तुति में संगीत और नृत्य का सधा हुआ तालमेल दिखाई दिया। मृणाल नागर ने तबले, मन्न माताई ने हारमोनियम एवं गायन, उस्ताद शफीक हुसैन ने सारंगी तथा डॉ.योगिता मांडलिक ने पढ़ंत के माध्यम से संगत की। कलाकारों की सामूहिक साधना और सधे हुए तालमेल ने प्रस्तुति को प्रभावपूर्ण बनाया।
पद्मश्री बारले के पंथी नृत्य ने बिखेरा लोकसंस्कृति का रंग
सांस्कृतिक संध्या के अगले चरण में पद्मश्री डॉ.राधेश्याम बारले और उनके दल ने पंथी नृत्य की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत झलक पेश की। पंथी की लयबद्ध थाप, ऊर्जावान पद संचालन और सामूहिक नृत्य ने दर्शकों को लोककला की विशिष्ट दुनिया से जोड़ा। प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, लोकजीवन की ऊर्जा और पारंपरिक कलाओं की जीवंतता स्पष्ट रूप से उभरी। शास्त्रीय संगीत और कथक के बाद पंथी नृत्य की प्रस्तुति ने सांस्कृतिक संध्या को लोकपरंपरा के रंगों से सराबोर कर दिया। दर्शकों ने देर तक प्रस्तुतियों का आनंद लिया।
शास्त्रीय साधना और लोकपरंपरा का साझा मंच
विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस पर आयोजित इस सांस्कृतिक आयोजन ने भारतीय शास्त्रीय कलाओं और छत्तीसगढ़ की लोकविधाओं के बीच समन्वय को रेखांकित किया। सितार, कथक और पंथी की प्रस्तुतियों ने कला की विविध परंपराओं को एक ही मंच पर स्थान दिया। खैरागढ़ की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध करने वाले इस आयोजन ने संगीत और नृत्य की विरासत के संरक्षण, संवर्धन तथा नई पीढ़ी तक उनके हस्तांतरण के महत्व को भी सामने रखा।


