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आमनेर से एक्युरियम तक की कविताओं पर विचार गोष्ठी

पाठक मंच व प्रगतिशील लेखक संघ इकाई खैरागढ़ का आयोजन

सत्यमेव न्यूज़/खैरागढ़. पाठक मंच व प्रगतिशील लेखक संघ इकाई खैरागढ़ के संयुक्त तत्वाधान में शनिवार 20 मई को संकल्प पहटिया द्वारा रचित आमनेर से एक्युरियम तक की इक्कीस कविताओं और एक गज़ल पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत में आमनेर से एक्युरियम तक की कविताओं से डॉ.जीवन यदु ने हमर छत्तीसगढ़ हरियर छत्तीसगढ़, रविंद्र पांडे ने गंगा उतर रही है, रवि यादव ने बाढ़े पूत पिता के धर्मे, डॉ.साधना अग्रवाल ने जंगल में मोर नाचने से पहले, विनय शरण सिंह ने लाला पान ठेला, यशपाल जंघेल ने रावण मारने के लिए, गिरधर सिंह राजपूत ने घर में रहने का मतलब और संकल्प पहटिया ने जबकि हमारे बीच कोई ऐसी बात नहीं तथा रंग कबीर का पाठ किया. वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.जीवन यदु ने पूरी विचार गोष्ठी को समेटते हुए कहा कि संकल्प की कविताएं अच्छी हैं, इसलिए कि समकालीन कविता में जो बातें होनी चाहिए वे उनकी कविताओं में मौजूद है. प्रकृति के माध्यम से प्रकृति उपस्थित तो है साथ ही पूरा मानव समाज भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है. विकास के नाम पर विनाश की दुखद गाथा उनकी कविताएं कहती है. उनकी कविता, प्रकृति तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि पूरे मानव और मानवेत्तर जगत को अपने दायरे में समेटती है. नए लिखने वाले कलमकार इनकी कविताओं से बहुत कुछ सीख सकते हैं. अपनी रचनाओं पर आए प्रश्नों पर बात रखते हुए श्री संकल्प पहटिया ने कहा कि रचना का प्रकाशन-प्रसारण होना बड़ी बात है पर उससे भी बड़ी बात है उस पर चर्चा होना. चर्चा से ही रचना और रचनाकार स्मृति से इतिहास की ओर का रास्ता तय करता है. आज बाईस रचनाओं पर चर्चा होना स्मृति से इतिहास की ओर जाने का महत्वपूर्ण चरण है.

विचार गोष्ठी का संचालन करते हुए प्रलेस के संरक्षक विनयशरण सिंह ने कहा कि संकल्प की कविता का दायरा गांव कस्बे से लेकर वैश्विक परिदृश्य तक व्याप्त है. राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों से आम आदमी का जीवन किस तरह प्रभावित होता है? यह उनकी कविताओं में दिखाई देता है. उनकी कविता में बाजार बार-बार आता है. पूंजीवाद के कारण मनुष्य का रिश्ता खत्म हो रहा है, उनकी कविता इसी खत्म होते रिश्ते को बचाए रखने की कोशिश करती है. व्यंग्य और करुणा पाठकों को आकर्षित करती है. स्थानीयता उनकी कविता की सबसे बड़ी खासियत है. आसपास की घटना, दृश्य और चरित्रों को गढऩे की उनमें अद्भुत क्षमता है. मानव जीवन के बिना कोई रचना सार्थक नहीं होती और उनकी रचनाओं में मानव जीवन की उपस्थिति हर जगह है. उनकी कविता में नदी और बाढ़ बार बार आती है, बिंब और प्रतीक के माध्यम से उन्होंने पर्यावरणीय चिंता को व्यक्त किया है.

डॉ.साधना अग्रवाल ने कहा कि वे कम शब्दों में अधिक अर्थ भरने की भरपूर कोशिश करते हैं. मिट्टी और प्रकृति से जुड़ी उनकी कविताएं रिश्तों की समझ को खोलती चलती है. स्थानीयता और सार्वभौमिकता का समावेश उनकी सभी कविताओं में है. मानवीय रिश्तों को लेकर उन्होंने अच्छी कविताएं लिखी हैं. टीके चंदेल ने कहा कि संकल्प आमनेर के बहाने प्रकृति और पर्यावरण के विनाश पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं. रविंद्र पांडेय ने कहा कि जिनके पास कहने के लिए ज् यादा कुछ नहीं होता वे पाठकों को सिर्फ चौकाते हैं जबकि संकल्प जी के साथ ऐसा नहीं है. वे ईमानदारी के साथ अपने समय व समाज की सच् चाई को कविता में रूपायित कर देते हैं. इसमें कहीं भी बनावटीपन या कृतिमता नहीं आती. स्वास्थ्यगत कारणों से डॉ.प्रशांत झा इस कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके लेकिन ऑनलाइन माध्यम से जुडक़र उन्होंने कहा कि वे एक किसान की तरह साहित्य से जुड़े हैं, इसीलिए उनकी रचना सामयिक जीवन के यथार्थ का उद्घाटन करती है. संकुचित होती जीवन शैली पर कुठाराघात करते हुए मनुष्य को खुलकर जीने की प्रेरणा देती है.

इसके पश्चात इन कविताओं पर एकाग्र आलेख का वाचन करते हुए यशपाल जंघेल ने कहा कि अपने परिवेश को शब्दों के माध्यम से पुनर्जीवित करने वाले युवा कवि संकल्प पहटिया आधुनिक हिंदी कविता में सार्थक हस्तक्षेप करते हैं. उनकी कविताएं अपने आसपास के जनजीवन से उनके लगाव और जुड़ाव का अनोखा दस्तावेज हैं. प्रकृति और लोकजीवन के पर्यवेक्षण के साथ-साथ समय की नब्ज पहचानने की क्षमता और शिल्पगत प्रौढ़ता ने उनके काव्य क्षितिज को नया विस्तार दिया है. वे हिंदी जगत में एक प्रभावविष्णु व क्षमतामान रचनाकार के रूप में सामने आए हैं. गिरधर सिंह राजपूत ने कहा कि कविता लिखने से पहले वे खोजी प्रवृत्ति की तरह शोध करते हैं, इसीलिए उनकी रचनात्मकता में गंभीरता होती है. उमराव साहू ने कहा कि संकल्प पहटिया युवा पीढ़ी को नई दिशा देने वाली कविताएँ लिखते हैं. जीवेश सिंह ने कहा कि उनकी कविता सहज व सरल होती है. सुनील यादव ने कहा कि संकल्प काफी चिंतन मनन के बाद कविता लिखते हैं साथ ही काव्य पाठ भी बढिय़ा करते हैं.

बलराम यादव ने कहा कि उनकी कविता प्रकृति से जुड़ी हुई है, साथ ही प्रकृति के साथ होने वाली विसंगतियों का चित्रण भी है. रवि यादव ने कहा कि उनकी कविता अपने परिवेश से ऊर्जा ग्रहण करती है. पाठक को लेकर उनकी कविताएँ घर, परिवार और मोहल्ले से लेकर देश दुनिया तक की यात्रा करती हैं. वे युवा कवियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं. दूजराम साहू ने कहा कि उनकी कविता में प्रकृति और बच् चों का अच्छा चित्रण है साथ ही दोनों को बचाने की मांग करती है. महादीप जंघेल ने कहा कि प्रकृति और समाज उनकी कविताओं में बार बार आया है. सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार और उनकी स्पष्टवादिता हमें कबीर की याद दिलाती है. पूरी कविताएँ सरल शब्दों से रचित और संप्रेषणीय हैं. कार्यक्रम को सफल बनाने में Ÿसुविमल श्रीवास्तव, मृत्युंजय यादव, आश्वला बार्बी, श्वेता जंघेल व लिलीप्रिया जंघेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

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