खैरागढ़ के सिविल अस्पताल में प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र में नियम विपरीत बिक रही थी ब्रांडेड दवाइयां, मेडिकल संचालकों के विरोध के बाद दुकान हुई सील

कमीशन खोरी के चक्कर में मेडिकल संचालक बेच रहा था महंगी दवाईयां
प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र बंद होने से अब सभी मरीजों को खरीदनी पड़ रही महंगी दवाईयां

सत्यमेव न्यूज/खैरागढ़. जिला मुख्यालय के सिविल अस्पताल में संचालित प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र में नियम विपरीत ब्रांडेड महंगी दवाईयां बेची जा रही थी. इस पूरे मामले में सिविल अस्पताल के कुछ चिकित्सक भी कमीशन खोरी के चलते संलिप्त रहे हैं. मामले की जानकारी निजी मेडिकल स्टोर संचालकों के विरोध के बाद सामने आयी जिसके बाद जन औषधि केंद्र को सील कर बंद कर दिया गया है. पूरे मामले को लेकर मेडिकल संचालको का कहना था कि जनौषधि केंद्र संचालक आशीष वर्मा बीते कई महीनों से जनौषधि के लिए निर्धारित दवाईयो के अलावा अन्य ब्रांड की एथिकल महंगी दवाईयॉ बेच रहा है. कई बार अनुरोध और अस्पताल प्रशासन द्वारा चेतावनी के बाद भी सुधार नही करने से उनका व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. मेडिकल संचालको की आपत्ति के बाद बीएमओ डॉ.विवेक बिसेन ने मौके पर आकर देखा कि सेंटर मे केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित जनौषधि के अलावा बड़ी तादात मे अलग अलग ब्रांड की दवाईयॉ भी मौजूद है. ब्रांडेड दवाईयों के दुकान पर उपलब्धता को लेकर भी संचालक आशीष वर्मा परचेस बिल नही दे पाया. इसके अलावा उन्हे मौके पर जीवनदीप समिति की ओपीडी पर्ची भी मिली जिसमे मंहगी ब्रांडेड दवाईयां लिखी हुई थी जबकि शासन-प्रशासन का स्पष्ट निर्देश है कि ओपीडी समय में चिकित्सक जीवनदीप की पर्ची में जेनरिक दवाईयॉ ही लिखे. जिसके बाद बीएमओ डॉ.बिसेन ने पंचनामा तैयार कर दुकान को सील कर दिया.
सिविल अस्पताल के चिकित्सकों पर लग रहा सरंक्षण का आरोप

जनौषधि केंद्र संचालक आशीष वर्मा की हरकत से कहीं अधिक मेडिकल संचालक सिविल अस्पताल मे पदस्थ कतिपय चिकित्सकों की कार्यशैली से नाराज है. उनका कहना है कि जब केंद्र और प्रदेश सरकार ने सीधे-सीधे शब्दो मे निर्देश जारी किया है कि ओपीडी मे बाह्य परीक्षण या इलाज के दौरान डॉक्टर मरीज को ज्यादातर जेनेरिक और जनौषधि केंद्र मे मिलने वाली सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाईयॉ ही लिखना है लेकिन यहॉ शासन-प्रशासन का फरमान बेअसर हो रहा है. मोटे कमीशन की लालच मे कुछ चिकित्सक जन औषधि केंद्र संचालक को संरक्षण दे रहे है और वहीं दवाईयां लिख रहे है जो उसके पास उपलब्ध है. मेडिकल संचालकों ने बताया कि मौसम मे आए बदलाव केे चलते रोज ओपीडी मे दो से ढाई सौ मरीजो का बाह्य परीक्षण हो रहा है लेकिन उनकी दुकान तक कोई मरीज या परिजन पर्ची लेकर नही पहुॅच रहे जिससे परेशान होकर उन्होने अपने स्तर पर जानकारी जुटाई तो पता चला कि जनौषधि केंद्र संचालक कतिपय डॉक्टर से सांठगॉठ कर निर्धारित नियमो की अनदेखी कर रहा है.
प्रधानमंत्री की छवि का दिया गया था हवाला लेकिन नही माना मेडिकल संचालक
मरीजो को सस्ती दवाईयॉ उपलब्ध कराने केंद्र सरकार ने सिविल अस्पताल परिसर में ही निर्धारित किराए पर प्रधानमंत्री जनौषधि केंद्र के लिए जगह उपलब्ध कराया है जबकि प्रदेश सरकार ने जेनरिक दवाईयो को बढ़ावा देने नगर पालिका के सामने जेनरिक दवाईयो का स्टोर शुरू किया है जहॉ उन्हें शासन द्वारा निर्धारित दवाईयॉ ही बेचनी है लेकिन जनौषधि केंद्र मे ऐसा नही हो रहा था. सिविल अस्पताल मे पदस्थ कुछ डॉक्टरो से सेटिंग के चलते निर्धारित जनौषधि दवाईयो के अलावा महंगी ब्रांडेड एथिकल दवाईया बिक रही थी. मामले को लेकर पाठकों को बता दें कि मेडिकल संचालको के अलावा अस्पताल प्रशासन ने भी केंद्र संचालक को मौखिक और लिखित रूप से चेतावनी दी थी कि वो एथिकल दवाईयॉ रखना और बेचना बंद करें तथा प्रधानमंत्री की छवि का ध्यान रखें क्योंकि उनके नाम से ही योजना के तहत जन औषधि केंद्र का संचालन किया जा रहा है. गौरतलब है कि पीएम भारतीय जनौषधि केंद्र मे केवल वही दवाईयॉ रखने बेचने की अनुमति है जिन्हे पीएमबीआई द्वारा आपूर्ति किया जाता है लेकिन आशीष वर्मा द्वारा पूर्व में भी इस प्रकार का कृत्य किया गया था जिसके चलते उसे विभाग के नई दिल्ली कार्यालय द्वारा स्पष्ट रूप से चेतावनी जारी कर कहा गया था कि उसके द्वारा केंद्र से ब्रांडेड दवाईयॉ बेचने के कारण पीएम नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण परियोजना जिसमे गरीबो को सस्ते दर पर दवाईयॉ उपलब्ध कराना है वह प्रभावित हो रहा है और पीएम की छवि भी प्रभावित हो रही है.
परियोजना के अनुबंध तहत निर्धारित नियमो का उल्लंघन कर ब्रांडेड दवाईयां बेचने के मामले में परीक्षण बाद नियमानुसार कारवाई की जाएगी.
अनीश वोडेतेलवार नोडल अधिकारी छग जनौषधि परियोजना
जनौषधि केंद्र मे मिली ब्रांउेड दवाईयो को लेकर परचेस बिल या चालान निर्धारित समय पर पेश नही करने से संचालक के खिलाफ ड्रग अधिनियम तहत विधिवत कारवाई की जाएगी.
संजय झाड़ेकर एडीआई