खैरबना में चाय वाले बाबा की श्रीमद्भागवत कथा में उमड़ रहा श्रद्धा का सागर

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। समीपस्थ ग्राम खैरबना में राजपरिवार के द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत पुराण कथा में प्रतिदिन श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ रही है। आध्यात्मिक वातावरण, वेद-पुराणों की गूढ़ व्याख्या और भावपूर्ण कथा-वाचन के चलते क्षेत्र में भक्ति और श्रद्धा का विशेष माहौल निर्मित हो गया है। कथा के दौरान व्यासपीठ से राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कथावाचक आचार्य नरेन्द्र नयन शास्त्री ने गुरु भक्ति, शरणागति और निष्काम भक्ति के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब भगवान के समक्ष एक साथ गुरु, भक्त और उनके चरण पकड़ने वाले के उद्धार का अवसर आता है तो प्रभु सबसे पहले उस व्यक्ति का उद्धार करते हैं जिसने गुरु अथवा अनन्य भक्त के चरणों में शरण ली होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि गुरु और सच्चा भक्त वही बन सकता है जिसका स्वयं का कल्याण पहले ही हो चुका होता है इसलिए उनके चरणों में शरण लेना ईश्वर की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल और प्रभावी मार्ग है। कथा के क्रम में गजेन्द्र मोक्ष प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया गया। आचार्य शास्त्री ने बताया कि स्नान के उपरांत सरोवर से निकलते समय गजेन्द्र का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया। लंबे संघर्ष और निराशा के बाद गजेन्द्र ने पूर्ण शरणागति भाव से कमल पुष्प अर्पित कर भगवान नारायण का स्मरण किया। भक्त की करुण पुकार सुनकर भगवान नारायण तुरंत प्रकट हुए और सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का वध कर पहले उसका उद्धार किया तत्पश्चात गजेन्द्र को मोक्ष प्रदान किया।

इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति गुरु या भगवान के अनन्य भक्त के चरणों को थाम लेता है उस पर ईश्वर की कृपा सर्वप्रथम होती है क्योंकि गुरु और भक्त के रूप में स्वयं भगवान ही विराजमान रहते हैं। कथा का सार प्रस्तुत करते हुए आचार्य शास्त्री ने कहा कि यदि मनुष्य सच्चे अर्थों में ईश्वर की कृपा प्राप्त करना चाहता है तो उसे सबसे पहले गुरु के चरणों में पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ शरण लेनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि आचार्य नरेन्द्र नयन शास्त्री जिन्हें चाय-चावल वाले बाबा के नाम से भी जाना जाता है अपने तपस्वी और त्यागमय जीवन के लिए देशभर में प्रसिद्ध हैं। वे विगत दो दशकों से अधिक समय से केवल जल और चाय पर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। याचकों द्वारा लाए गए चावल के माध्यम से भूत, वर्तमान और भविष्य की गणना एवं समाधान करने की उनकी विशिष्ट शैली उन्हें अन्य कथावाचकों से अलग पहचान देती है। सैकड़ों श्रीमद्भागवत कथाओं के आयोजन के बावजूद आचार्य शास्त्री चढ़ावे की राशि को निर्धन कन्याओं के विवाह जैसे सामाजिक कार्यों में दान कर देते हैं तथा स्वयं केवल आशीर्वाद देकर श्रद्धालुओं को विदा करते हैं। उनके इस निष्काम सेवा भाव और आध्यात्मिक जीवन शैली ने उन्हें जनमानस में विशेष सम्मान दिलाया है।

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