एक ही जमीन पर ‘विकास’ और ‘विस्थापन’की कहानी! लमती डेम परियोजना को लेकर ग्रामीणों ने जताया विरोध

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। जिले में प्रस्तावित लमती डेम परियोजना को लेकर विवाद तेज हो गया है। विकास और विस्थापन के बीच उलझे इस मुद्दे ने अब जनआंदोलन का रूप लेना शुरू कर दिया है। जिले के अंतिम छोर पर वनांचल क्षेत्र में बसे ग्राम लछना, बोरला, महुआढार और कटेमा के सैकड़ों ग्रामीण जिला मुख्यालय पहुंचकर विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए और प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई। भीषण गर्मी के बीच घंटों इंतजार के बावजूद जब कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा तो ग्रामीणों का आक्रोश और बढ़ गया। अंततः उन्होंने ज्ञापन सौंपते हुए चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र सुनवाई नहीं हुई तो आंदोलन और उग्र किया जाएगा। गौर करें कि विवाद की जड़ में एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। जिन क्षेत्रों को प्रस्तावित डेम के डुबान क्षेत्र में शामिल बताया जा रहा है वहीं दूसरी ओर सरकार द्वारा विकास कार्य भी कराए जा रहे हैं। पंचायत के माध्यम से सीसी रोड का निर्माण जारी है और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत कई मकान बनाए जा रहे हैं। इससे ग्रामीणों में असमंजस और अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि लमती नदी उनके जीवन का आधार है। यह न केवल खेती और रोजगार का मुख्य स्रोत है बल्कि दैनिक आवागमन का भी प्रमुख मार्ग है। प्रस्तावित डेम के निर्माण से लछनाटोला सहित कई बस्तियां डुबान में आ सकती हैं जिससे हजारों लोगों के विस्थापन का खतरा पैदा हो गया है। इस विरोध के पीछे पुराने अनुभव भी अहम कारण हैं। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पूर्व में निर्मित प्रधानपाट बैराज करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद वर्षों से अनुपयोगी और जर्जर पड़ा है। ऐसे में नई परियोजना पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों की मांग है कि नई परियोजना शुरू करने के बजाय पुराने बैराज का जीर्णोद्धार किया जाए।

इस गंभीर मामले को लेकर ग्रामीणों की कुछ मांगे सामने आई है जिसमें प्रमुख रूप से डुबान क्षेत्र का स्पष्ट नक्शा-खसरा सार्वजनिक करने। जमीन से संबंधित सभी दस्तावेज और एनओसी उपलब्ध कराने। प्रभावित ग्रामीणों की सहमति के बिना निर्माण कार्य रोकने व नई परियोजना के बजाय पुराने बैराज का पुनर्निर्माण करने की मांग प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों ने की है।

लमती डेम निर्माण से बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र प्रभावित होने की आशंका है। माना जा रहा है कि यहां हजारों की संख्या में हरे-भरे वृक्षों की बली दे दी जाएगी। ग्रामीणों के अनुसार इससे वन्यजीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है और वन आधारित अर्थव्यवस्था पर भी इसका विपरीत असर पड़ेगा।

पूरे मामले में प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीण एवं किसानों का पक्ष लेकर जिला मुख्यालय पहुंचे किसान संघ के प्रदेश संयोजक सुदेश टीकम ने कहा है कि सरकार को विकास योजनाओं में पारदर्शिता रखनी चाहिए। किसानों और ग्रामीणों की सहमति के बिना इस तरह की परियोजनाएं लागू करना उचित नहीं है। यदि पुराने बैराज को सुधारा जा सकता है तो नई परियोजना थोपना जनहित के खिलाफ है वहीं ग्राम पंचायत लछना के सरपंच कमलेश वर्मा ने बताया कि गांव में अजीब स्थिति बन गई है। एक ओर विकास कार्य हो रहे हैं दूसरी ओर उसी जमीन के डूबने का खतरा है। लोग अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। हमारी मांग है कि सरकार और जिला प्रशासन पहले अपनी स्पष्ट नीति सामने रखे। बहरहाल गौर करने वाली बात यह है कि लमती डेम परियोजना अब केवल एक विकास योजना नहीं रह गई है बल्कि यह नीति, पारदर्शिता और जनसहमति का बड़ा सवाल बन चुकी है। खैरागढ़ के वनांचल क्षेत्र से उठी वनवासियों की सामूहिक आवाज यह संकेत दे रही है कि विकास की दिशा तय करते समय स्थानीय लोगों के अधिकार और विश्वास को नजरअंदाज करना भविष्य में लोकतंत्र के कथित रक्षकों को भारी पड़ सकता है।

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