सिद्धबाबा जलाशय निर्माण में बड़े भ्रष्टाचार की आशंका

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़/छुईखदान। खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के छुईखदान विकासखंड अंतर्गत ग्राम गभरा-घिरघोली में निर्माणाधीन श्री सिद्धबाबा जलाशय परियोजना गंभीर आरोपों के चलते विवादों में घिर गई है। स्थानीय ग्रामीणों और क्षेत्रीय नागरिकों ने आरोप लगाया है कि परियोजना में उपयोग किए जा रहे पत्थर वैधानिक प्रक्रिया के तहत खरीदे जाने के बजाय आसपास के जंगलों एवं शासकीय भूमि से अवैध रूप से तोड़कर सीधे निर्माण कार्य में लगाए जा रहे हैं। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला न केवल प्राकृतिक संसाधनों के अवैध दोहन का होगा बल्कि करोड़ों रुपये के शासकीय राजस्व नुकसान, वित्तीय अनियमितता और विभागीय लापरवाही का भी बन सकता है।

स्थानीय लोगों का दावा है कि निर्माण स्थल पर बाहरी स्रोतों से पत्थर अपेक्षित मात्रा में नहीं पहुंच रहे हैं। आरोप है कि निर्माण एजेंसी द्वारा आसपास के शासकीय क्षेत्र और जंगलों से ही पत्थर निकालकर उनका उपयोग किया जा रहा है जबकि भुगतान बाजार दरों और स्वीकृत निर्माण सामग्री के आधार पर दर्शाया जा रहा है। यदि ऐसा हुआ है तो यह सरकारी धन के दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितता का गंभीर मामला हो सकता है।

मामले को लेकर हमारे प्रतिनिधि के अनुसार किसी भी सरकारी निर्माण कार्य में उपयोग होने वाली खनिज सामग्री के लिए वैध खनन, रॉयल्टी भुगतान तथा सक्षम विभागों की अनुमति अनिवार्य होती है। बिना अनुमति शासकीय भूमि अथवा वन क्षेत्र से पत्थर निकालना खनिज नियमों और पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन माना जा सकता है। ऐसे मामलों में संबंधित विभागों की जवाबदेही भी तय होती है।

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने वाली इस महत्वाकांक्षी परियोजना की निर्माण गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। तकनीकी जानकारों का मानना है कि यदि निर्माण सामग्री निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है या गुणवत्ता नियंत्रण की अनदेखी की गई है तो भविष्य में जलाशय की मजबूती, सुरक्षा और उपयोगिता प्रभावित हो सकती है। इससे सार्वजनिक धन से निर्मित इस परियोजना का उद्देश्य भी प्रभावित होने की आशंका है।

क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की जानकारी अथवा संरक्षण में पूरा निर्माण कार्य संचालित किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि परियोजना से जुड़े एक सब इंजीनियर का प्रभाव इतना अधिक है कि निर्माण कार्य की प्रभावी निगरानी नहीं हो रही और उच्च अधिकारियों के साथ इंजिनियर की सांठगांठ होने से नियमों की अनदेखी की जा रही है। हालांकि इन आरोपों की अभी तक किसी सक्षम एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

जल संसाधन विभाग इससे पहले भी विभिन्न मामलों में भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों को लेकर चर्चा में रहा है। विभाग के कार्यपालन अभियंता कार्यालय में पदस्थ एक लिपिक द्वारा भी पूर्व में गंभीर आरोप लगाए गए थे। स्थानीय लोगों का आरोप है कि हर बार विभागीय स्तर पर मामले को दबाने और दोषियों को बचाने का प्रयास किया जाता रहा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी शेष है।

मामले को लेकर ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने शासन से मांग की है कि जल संसाधन विभाग, खनिज विभाग, वन विभाग तथा स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों की संयुक्त उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की जाए। जांच में निर्माण सामग्री के स्रोत, रॉयल्टी भुगतान, गुणवत्ता परीक्षण, वित्तीय अभिलेख तथा संबंधित अधिकारियों और निर्माण एजेंसी की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यदि सरकारी परियोजना में वास्तव में जंगलों और शासकीय भूमि से अवैध रूप से पत्थर निकालकर निर्माण कराया गया है तो जिम्मेदारी किसकी है? क्या विभागीय अधिकारियों ने इस पर आंखें मूंद रखी है या फिर यह सब उनकी जानकारी में हुआ? इन सवालों का जवाब अब केवल निष्पक्ष और समयबद्ध जांच ही दे सकती है।

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