साक्षात् अन्नपूर्णा का स्वरूप हैं मां शाकंभरी देवी, खैरागढ़ में लगातार पांचवें वर्ष भी विराजीं माता

छत्तीसगढ़ में विशिष्ट पहचान बना रही पटेलपारा की पहल
नवरात्रि में साग-सब्जियों से सुसज्जित प्रतिमा के दर्शन कर रहे श्रद्धालु
खैरागढ़। मां अन्नपूर्णा के स्वरूप और साग-सब्जियों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजित मां शाकंभरी देवी की भव्य प्रतिमा खैरागढ़ के “पटेल पारा” में इस वर्ष भी श्रद्धा और भक्ति के साथ स्थापित की गई है। जय मां शाकंभरी सेवा समिति की इस पहल ने नगर में धार्मिक आस्था की एक विशिष्ट पहचान बनाई है। समिति द्वारा लगातार पांचवें वर्ष माता की प्रतिमा स्थापित की गई है। आयोजकों के अनुसार छत्तीसगढ़ में इस स्वरूप की प्रतिमा स्थापना की यह अनूठी पहल है। नवरात्रि के पावन अवसर पर स्थापित मां शाकंभरी देवी की आकर्षक प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। साग-सब्जियों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में माता की आराधना प्रकृति, अन्न और वनस्पतियों के प्रति कृतज्ञता का संदेश भी देती है। समिति की इस पहल से धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ माता के विशिष्ट स्वरूप के प्रति जनआस्था भी मजबूत हो रही है।
अकाल के संकट से मुक्ति दिलाने वाली देवी हैं शाकंभरी
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां शाकंभरी और मां शताक्षी एक ही देवी के स्वरूप हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब दुर्गमासुर के अत्याचारों के कारण पृथ्वी पर जल और अन्न का संकट उत्पन्न हो गया था तब भगवती ने अपने शरीर पर सौ नेत्र प्रकट किए। इसी कारण वे शताक्षी कहलाईं। मान्यता है कि माता ने अपनी करुणा से वर्षा कराकर धरती को फिर से जीवन प्रदान किया और जीव-जगत के पोषण के लिए साग-सब्जियों की उत्पत्ति की। इसी स्वरूप में वे मां शाकंभरी के नाम से पूजित हुईं। मां शाकंभरी को अन्न, वनस्पति और जीवनदायिनी प्रकृति की देवी माना जाता है। खैरागढ़ के “पटेल पारा” में समिति द्वारा प्रतिवर्ष उनकी प्रतिमा स्थापना की परंपरा इसी धार्मिक आस्था को समर्पित है। नवरात्रि के दौरान माता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का पहुंचना नगर के धार्मिक वातावरण को और भक्तिमय बना रहा है।
