लोककलाओं को डिजिटल मंच से दुनिया तक पहुंचाएं- राज्यपाल डेका

खैरागढ़। राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय के 70वें स्थापना दिवस समारोह में कला-संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन पर उपस्थित अतिथियों द्वारा जोर दिया गया। राज्यपाल एवं कुलाधिपति रमेन डेका ने कहा कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककलाओं को डिजिटल माध्यमों से देश-दुनिया तक पहुंचाने की जरूरत है। सांसद संतोष पांडे ने विश्वविद्यालय की स्थापना में राजपरिवार के योगदान को ऐतिहासिक बताते हुए इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बताया। समारोह की शुरुआत राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राज्यगीत और विश्वविद्यालय गीत से हुई। राज्यपाल रमेन डेका, सांसद संतोष पांडे और कुलपति प्रो.लवली शर्मा ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर संस्थापक राजकुमारी इंदिरा सिंह के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।

विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए राज्यपाल श्री डेका ने कहा कि संगीत हम सबको मानसिक शांति देता है। जबकि नृत्य, चित्रकला और शिल्प समाज की सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करते हैं। उन्होंने पंडवानी, पंथी, राउत नाचा, सुवा और कर्मा जैसी लोककलाओं को डिजिटल मंचों के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाने का आह्वान किया वहीं विद्यार्थियों को धैर्य, अभ्यास और समर्पण के साथ कला को आजीविका से जोड़ने की सलाह भी दी।

सांसद संतोष पांडे ने कहा कि राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती ने पुत्री राजकुमारी इंदिरा सिंह की स्मृति में विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए जो योगदान दिया है वह ऐतिहासिक है। इस संस्थान ने खैरागढ़ को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।

कुलपति प्रो.लवली शर्मा ने विश्वविद्यालय की सात दशक की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया कि यहां देश के विभिन्न राज्यों के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका और वियतनाम के विद्यार्थी एवं शोधार्थी अध्ययन कर रहे हैं। विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित कलाकार राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उन्होंने शिक्षकों, संगत कलाकारों और कर्मचारियों की कमी के साथ अतिरिक्त भवनों की आवश्यकता बताते हुए शासन से सहयोग मांगा तथा बताया कि महिला यूथ पार्लियामेंट का आयोजन जनवरी में प्रस्तावित है। कार्यक्रम संचालक व कला संकाय के डीन डॉ.राजन यादव ने प्रदेश के प्रत्येक जिले के दस हायर सेकेंडरी स्कूलों में ललित कला शिक्षकों की नियुक्ति का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इससे ग्रामीण प्रतिभाओं को गायन, वादन, नृत्य और लोकसंगीत का प्रशिक्षण स्थानीय स्तर पर मिल सकेगा। अंत में प्रभारी कुलसचिव प्रो.आर.वेंकट रमण गुड़े ने आभार जताया। सांस्कृतिक संध्या में मुंबई के डॉ.जुनैन हलीम जाफर खान, इंदौर की डॉ.सुचित्रा हरमलकर तथा पद्मश्री डॉ.राधेश्याम बारले और उनके समूह की प्रस्तुतियां आकर्षण के केंद्र में रही।

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