
आस्था, उल्लास और रचनात्मकता से सजा समूचा अंचल
खैरागढ़ के राजा से लेकर पुरी के जगन्नाथ मंदिर की प्रतिकृतियां बनीं आकर्षण का केंद्र
सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश के स्वागत में सोमवार को संगीत, कला और साहित्य की समृद्ध नगरी खैरागढ़ सहित समूचा अंचल भक्तिमय हो उठा। गणेश चतुर्थी के अवसर पर सुबह से ही घरों और सार्वजनिक स्थलों पर विधि-विधान से गणपति की स्थापना का सिलसिला शुरू हुआ जो देर शाम तक चलता रहा। खैरागढ़ के अलावा छुईखदान, गंडई, साल्हेवारा, नर्मदा, पैलिमेटा, सड़क अतरिया, दनिया-बुंदेली, बाजार अतरिया, मुढ़ीपार, पांडादाह, जालबांधा, ठेलकाडीह सहित कस्बों और गांवों में जगह-जगह गणपति बप्पा की प्रतिमाएं विराजित की गईं।
गणेश उत्सव को लेकर बच्चों, युवाओं और समितियों में खासा उत्साह नजर आया। डीजे, धुमाल और गाजे-बाजे के साथ गणपति की प्रतिमाओं को पंडालों तक पहुंचाया गया। स्थापना के दौरान श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और विघ्नों के निवारण की कामना की। सार्वजनिक गणेश पंडालों में आकर्षक साज-सज्जा, विद्युत रोशनी और धार्मिक झांकियों की तैयारियां भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
खैरागढ़ के राजा से पुरी के जगन्नाथ मंदिर तक दिखेगा कला का वैभव
गणेश उत्सव की करीब सौ वर्ष पुरानी परंपरा वाले खैरागढ़ में इस बार भी उत्सव ने धार्मिक आस्था के साथ कला और रचनात्मकता का रंग धारण किया है। फतेह मैदान मुख्य द्वार पर ‘खैरागढ़ के राजा’ की भव्य गणेश प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी है। लाल रंग के आकर्षक पंडाल को विद्युत सज्जा से सजाया गया है जो रात में विशेष रूप से मनोहारी नजर आ रहा है। ठाकुरपारा स्थित बांके बिहारी मंदिर परिसर में इस वर्ष मुंबई के छत्रपति शिवाजी की तर्ज पर गणपति बप्पा की स्थापना की गई है। यहां पंडाल को ओडिशा के प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर का स्वरूप दिया गया है। मंदिर की प्रतिकृति तैयार करने में बंगाल से आए कारीगरों ने एक माह से अधिक समय तक मेहनत की है। पंडाल की बारीक कारीगरी और भव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण बना हुआ है वहीं नया बस स्टैंड में करीब 35 वर्षों से चली आ रही गणेश उत्सव की परंपरा को इस वर्ष भी युवाओं ने आगे बढ़ाया है। यहां आकर्षक पंडाल में गणपति की मनोहारी प्रतिमा स्थापित की गई है। समिति द्वारा उत्सव के दौरान शिव-पार्वती परिवार की आकर्षक झांकी भी प्रस्तुत की जाएगी।
आस्था के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का स्वरूप
गौरतलब हो कि खैरागढ़ में गणेशोत्सव केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहा है। वर्षों से चली आ रही परंपरा ने इसे सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का भी माध्यम बना दिया है। अलग-अलग समितियों द्वारा पंडालों की सजावट, झांकियों और अन्य आयोजनों के माध्यम से स्थानीय कला एवं रचनात्मकता को मंच दिया जा रहा है। बच्चों और युवाओं की भागीदारी से उत्सव में नई ऊर्जा देखने को मिल रही है। बता दे कि गणेश चतुर्थी के साथ शुरू हुआ यह उत्सव आगामी दिनों में पूरे अंचल में श्रद्धा, उमंग और सामूहिक सहभागिता का वातावरण बनाए रखेगा। पंडालों में सुबह-शाम आरती और धार्मिक आयोजनों के साथ श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने की उम्मीद है।
जानिए क्या है गणेश चतुर्थी का धार्मिक महत्व
विघ्नहर्ता के पूजन से शुभ कार्यों की शुरुआत की मान्यता है और
हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन की परंपरा है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। गणेशोत्सव श्रद्धा के साथ-साथ सामूहिकता, भाईचारे और सांस्कृतिक सहभागिता का पर्व भी बन गया है। यही वजह है कि घरों से लेकर सार्वजनिक पंडालों तक गणपति स्थापना को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिलता है।