1857 से पहले भी जनजातीय समाज ने लड़ी थी आज़ादी की लड़ाई-राजन यादव

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। आदिवासी साहित्य में लोक परंपरा विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं कला संकाय अधिष्ठाता प्रो. राजन यादव मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। यह संगोष्ठी उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश तथा शाह कुंवर रघुनाथ शाह शासकीय महाविद्यालय मेंहदवानी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई। समापन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. यादव ने कहा कि 1857 के गदर से पूर्व भी जनजातीय समाज अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत था। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जनजातीय समुदाय अपनी विशिष्ट लोक परंपराओं, रीति-रिवाजों और जीवन शैली के माध्यम से सांस्कृतिक पहचान को सहेजे हुए हैं। उन्होंने संथाल विद्रोह के महानायक बिरसा मुंडा के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि जनजातीय बलिदानों को इतिहास में समुचित स्थान मिलना चाहिए। संगोष्ठी में विश्वप्रसिद्ध ललित निबंधकार प्रो. श्रीराम परिहार खंडवा डॉ. लक्ष्मीकांत चंदेला अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा एवं प्रो. पी.आर. चंदेलकर अपर संचालक, उच्च शिक्षा, जबलपुर संभाग सहित विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्य, प्राध्यापक और शोधार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. शाशिकांत चंदेला ने प्रो. राजन यादव को शाल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह एवं पुस्तक भेंट कर सम्मानित किया।

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