दशहरे पर 12 घंटे में 1.06 करोड़ की शराब गटक गए केसीजी जिले के शराबी!

खैरागढ़। त्योहार खुशियां बांटने, परिवार के साथ समय बिताने और सामाजिक सौहार्द बढ़ाने का अवसर होते हैं लेकिन जब उत्सवों के साथ शराब की खपत का बढ़ता आंकड़ा चर्चा में आने लगे तो समाज को आत्ममंथन की जरूरत महसूस होती है। खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (केसीजी) जिले में विजयादशमी के दिन महज 12 घंटे के भीतर एक करोड़ छह लाख रुपये से अधिक की शराब की बिक्री ने इसी सवाल को सामने ला दिया है कि क्या त्योहारों की खुशियां अब नशे से जुड़ती जा रही हैं? गौर करें कि जिले की सीमित आबादी और भौगोलिक क्षेत्रफल को देखते हुए शराब बिक्री का यह आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है। शारदीय नवरात्रि के दौरान शराब दुकानों में अपेक्षाकृत कम भीड़ रही लेकिन दशहरे के दिन सुबह दुकानें खुलते ही खरीदारों की आवाजाही बढ़ गई। खैरागढ़, छुईखदान और गंडई के साथ जिले के ग्रामीण क्षेत्रों की दुकानों में भी ग्राहकों की भीड़ नजर आई। कुछ दुकानों पर चुनिंदा ब्रांड का स्टॉक कम पड़ने की स्थिति भी बनी रही।

शराब की बिक्री से शासन को आबकारी राजस्व मिलता है, लेकिन केवल कमाई के आंकड़े से इस प्रवृत्ति के सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अत्यधिक शराब सेवन परिवारों की आर्थिक स्थिति, घरेलू शांति, स्वास्थ्य और सड़क सुरक्षा पर प्रतिकूल असर डाल सकता है। त्योहारों के दौरान नशे में वाहन चलाने और विवाद की आशंका भी बढ़ जाती है। हालांकि बिक्री के आंकड़े से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इतनी शराब का सेवन उसी दिन हुआ या सभी खरीदारों ने इसका व्यक्तिगत रूप से उपभोग किया। फिर भी इतनी बड़ी बिक्री उत्सवों के दौरान शराब की मांग और उससे जुड़े सामाजिक पहलुओं पर चर्चा की जरूरत जरूर पैदा करती है।

जिला आबकारी अधिकारी के अनुसार दशहरे के दिन अवैध शराब बिक्री अथवा निर्धारित दर से अधिक कीमत वसूलने की शिकायत सामने नहीं आई। विभाग के मुताबिक बिक्री की प्रक्रिया शांतिपूर्ण रही। लेकिन त्योहारों के दौरान प्रशासन की जिम्मेदारी केवल अवैध बिक्री पर नियंत्रण तक सीमित नहीं होनी चाहिए। नशे में वाहन चलाने पर रोक, सार्वजनिक स्थलों पर निगरानी और शराब के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता भी जरूरी है। त्योहारों का वास्तविक उद्देश्य खुशियां बांटना और सामाजिक एकता को मजबूत करना है। ऐसे में जरूरी है कि उत्सव का आनंद नशे पर निर्भर न हो। परिवार, समाज और प्रशासन की साझा पहल से ही त्योहारों को सुरक्षित, स्वस्थ और सार्थक बनाया जा सकता है।

एक दिन में 1.06 करोड़ रुपये से अधिक की शराब बिक्री ने कई सवाल खड़े कर दिए है जिसमें बिक्री का आंकड़ा: विजयादशमी पर 12 घंटे में एक करोड़ छह लाख रुपये से अधिक की शराब बिकी वहीं मांग में उछाल के चलते नवरात्रि के मुकाबले दशहरे पर दुकानों में अधिक भीड़ दिखाई दी। राजस्व बनाम समाज की स्थिति देखे तो सरकारी कमाई के साथ शराबखोरी के सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों पर भी विचार अब जरूरी हो चला है दूसरी ओर सुरक्षा की चुनौती भी बढ़ी है ऐसे में त्योहारों के दौरान नशे में वाहन चलाने और विवादों की रोकथाम पर विशेष ध्यान देने की जरूरत।बहरहाल सकारात्मक संदेश यह है कि उत्सव की खुशियां परिवार, मित्रता और सामाजिक सद्भाव से बढ़ाई जाये न कि नशे और मांसाहार को उसका आधार बनाएं।त्योहार में खुशियां बांटने के लिए हैं नशे में डूबने के लिए नहीं। जिम्मेदारी से ही हम किसी उत्सव को सुरक्षित समाज की पहचान दे सकते है।

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