खैरागढ़ में कृष्ण भक्ति के तीन रंग, सदियों पुरानी विरासत के तीन नाम- ‘बनबिहारी’, ‘गैंद बिहारी’ और राजमहल के द्वार पर विराजे ‘फतह बिहारी’

सत्यमेव न्यूज खैरागढ़। जन्माष्टमी के अवसर पर खैरागढ़ कृष्ण भक्ति में डूबा रहा लेकिन यहां भगवान श्रीकृष्ण की आराधना केवल पर्व विशेष तक सीमित नहीं है। शहर की धार्मिक परंपराओं और रियासतकालीन विरासत में कृष्ण के अलग-अलग स्वरूप आज भी जीवंत हैं। जमातपारा के करीब तीन सौ वर्ष पुराने बनबिहारी मंदिर से लेकर गैंद बिहारी सरकार मंदिर और कमल विलास पैलेस से जुड़े फतह बिहारी तक खैरागढ़ में कृष्ण भक्ति इतिहास, लोकमान्यताओं और राजपरिवार की परंपराओं से गहराई से जुड़ी दिखाई देती है।

जमातपारा स्थित श्रीराधा-कृष्ण बनबिहारी मंदिर को करीब तीन सौ वर्ष से अधिक पुराना बताया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार खैरागढ़ रियासत के संस्थापक प्रथम नागवंशी राजा खड़गसिंह ने अपनी कृष्ण भक्त पत्नी के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया था।
स्थानीय लोगों के अनुसार पुराने समय में खैरागढ़ खैर के घने जंगलों से घिरा था। इसी ‘बन’ और कृष्ण के ‘बिहारी’ स्वरूप से मंदिर का नाम ‘बनबिहारी’ पड़ने की मान्यता है। मंदिर के पुजारी धनंजय महाराज के अनुसार यहां भगवान कृष्ण की नृत्य मुद्राओं वाली प्रतिमाएं भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं। मान्यता है कि भगवान कृष्ण वन में गाय चराने जाते और लौटकर गोपियों के साथ रास रचाते थे। पुरानी परंपराओं में इस मंदिर का संबंध साधु-संतों के जमावड़े और मालपुए के प्रसाद से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय मान्यता है कि साधु-संतों की इसी ‘जमात’ के कारण आसपास का क्षेत्र आगे चलकर ‘जमातपारा’ कहलाया।

खैरागढ़ की कृष्ण परंपरा का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव श्री गैंद बिहारी सरकार मंदिर है। स्थानीय परंपरा के अनुसार महाराजा कमल नारायण सिंह देवी उपासक थे जबकि उनकी पत्नी रानी गैंद कुंवर भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थीं। इसी भक्ति से भगवान के विग्रह को ‘गैंद बिहारी’ नाम मिलने की परंपरा बताई जाती है। इस मंदिर से करीब डेढ़ सौ वर्ष पुरानी रथयात्रा की परंपरा जुड़े होने का भी उल्लेख मिलता है। इस तरह ‘गैंद बिहारी’ केवल भगवान का संबोधन नहीं बल्कि खैरागढ़ के राजपरिवार की धार्मिक आस्था और स्थानीय सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बन चुका है।

खैरागढ़ की कृष्ण भक्ति की एक और विशिष्ट कड़ी कमल विलास पैलेस से जुड़ी है। पैलेस के ईशानमुखी मुख्य द्वार के पास भगवान कृष्ण के ‘फतह बिहारी’ स्वरूप की परंपरा बताई जाती है। राजवंशीय परंपरा के अनुसार लाल फतह सिंह खैरागढ़ राजपरिवार से जुड़े थे और राजा उमराव सिंह के पिता थे। इन्हीं के नाम से भगवान कृष्ण के इस स्वरूप को ‘फतह बिहारी’ कहे जाने की मान्यता है। कमल विलास पैलेस परिसर में स्थित प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर लंबे समय तक आम श्रद्धालुओं की पहुंच से दूर रहा। बाद में साफ-सफाई और पूजा-अर्चना के बाद मंदिर को श्रद्धालुओं के लिए फिर खोला गया। इससे खैरागढ़ की इस पुरानी कृष्ण परंपरा को एक बार फिर सार्वजनिक पहचान मिली।

जन्माष्टमी पर जहां इन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी वहीं इनके संरक्षण का सवाल भी सामने है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार बनबिहारी मंदिर की करीब तीन से चार एकड़ जमीन पर अतिक्रमण के कारण मूल परिसर काफी सीमित हो गया है। स्थानीय लोगों की मांग है कि मंदिर की जमीन को सुरक्षित किया जाए प्राचीन संरचना का संरक्षण हो और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए परिसर में डोम का निर्माण कराया जाए।

खैरागढ़ की कृष्ण भक्ति की विशिष्टता यही है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण केवल पूजा के केंद्र नहीं बल्कि शहर की सामाजिक और रियासतकालीन स्मृतियों के भी अभिन्न हिस्सा हैं। बनबिहारी, गैंद बिहारी और फतह बिहारी- तीनों नाम खैरागढ़ के इतिहास, लोकविश्वास और राजपरंपरा की अलग-अलग कड़ियों को जोड़ते हैं। जन्माष्टमी हर वर्ष आती है और चली जाती है लेकिन इन मंदिरों और परंपराओं में खैरागढ़ की सदियों पुरानी सांस्कृतिक स्मृति सुरक्षित है। इसलिए आवश्यकता केवल उत्सव मनाने की नहीं बल्कि इन ऐतिहासिक धार्मिक धरोहरों को अतिक्रमण और उपेक्षा से बचाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने की भी है।

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